"हम ज़िंदगी को जीते ज़्यादा हैं, समझते कम हैं"
बचपन में हमें लगता है कि बड़े हो जाने पर सब समझ आ जाएगा। फिर हम बड़े हो जाते हैं और पता चलता है कि बड़े लोग भी उतने ही उलझे हुए हैं जितने कभी हम थे।
फ़र्क बस इतना होता है कि अब सवाल बदल चुके होते हैं।
पहले चिंता होती थी कि परीक्षा में कितने अंक आएंगे। अब चिंता होती है कि करियर कैसा चलेगा, घर कैसे संभलेगा, लोग क्या सोचेंगे, भविष्य कैसा होगा। एक चिंता जाती है तो दूसरी आ जाती है।
इसी भागदौड़ में साल बीतते जाते हैं।
कभी आपने ध्यान दिया है कि हम अपनी ज़िंदगी का कितना बड़ा हिस्सा किसी आने वाले दिन का इंतज़ार करते हुए बिताते हैं?
"बस यह काम हो जाए..."
"बस थोड़ा और पैसा आ जाए..."
"बस यह परेशानी खत्म हो जाए..."
हमें लगता है कि उसके बाद चैन मिलेगा। लेकिन जैसे ही एक लक्ष्य पूरा होता है, दूसरा सामने खड़ा मिल जाता है।
फिर एक दिन अचानक पुरानी तस्वीरें सामने आ जाती हैं। कोई पुराना गाना सुनाई दे जाता है। कोई पुराना दोस्त मिल जाता है। और तब एहसास होता है कि जिन दिनों को हम साधारण समझकर जी रहे थे, वही तो सबसे अच्छे दिन थे।
ज़िंदगी अक्सर पीछे मुड़कर देखने पर समझ आती है।
आज की दुनिया में हर कोई व्यस्त है। इतना व्यस्त कि कई बार खुद से मिलने का भी समय नहीं बचता।
लोग सुबह से रात तक काम करते हैं, फोन देखते हैं, संदेशों का जवाब देते हैं, योजनाएँ बनाते हैं, लेकिन जब कुछ मिनट अकेले बैठते हैं तो बेचैनी महसूस होने लगती है।
शायद इसलिए क्योंकि बाहर का शोर इतना बढ़ गया है कि भीतर की आवाज़ सुनाई ही नहीं देती।
हम दूसरों के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन खुद के बारे में बहुत कम।
हमें पता होता है कि कौन क्या कर रहा है, किसकी नौकरी कहाँ लगी, किसने क्या खरीदा, किसकी शादी हुई, कौन कहाँ घूमने गया। लेकिन यह नहीं पता होता कि हमें वास्तव में क्या अच्छा लगता है, किस बात से खुशी मिलती है और किस बात से मन टूटता है।
कई लोग पूरी ज़िंदगी वही बनने की कोशिश करते रहते हैं जो लोग उन्हें देखना चाहते हैं।
धीरे-धीरे वे इतने चेहरे पहन लेते हैं कि अपना असली चेहरा ही भूल जाते हैं।
सबको खुश करने की कोशिश में इंसान खुद से दूर होता जाता है।
और यह दूरी बाहर से दिखाई नहीं देती।
कुछ लोग बहुत मुस्कुराते हैं, लेकिन भीतर से थके हुए होते हैं।
कुछ लोग बहुत सफल दिखाई देते हैं, लेकिन रात को चैन से सो नहीं पाते।
कुछ लोगों के पास सब कुछ होता है, फिर भी उन्हें लगता है कि कुछ कमी है।
शायद इसलिए कि इंसान सिर्फ़ चीज़ों से नहीं जीता।
उसे अपनापन चाहिए।
समझे जाने का एहसास चाहिए।
ऐसे लोग चाहिए जिनके सामने वह बिना किसी दिखावे के रह सके।
समय के साथ एक और बात समझ आने लगती है।
हर लड़ाई लड़ना ज़रूरी नहीं होता।
हर बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता।
हर किसी को अपनी सफ़ाई देना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ बातें छोड़ देने से जीवन हल्का हो जाता है।
कभी-कभी चुप रहना बहस जीतने से ज़्यादा समझदारी का काम होता है।
कभी-कभी आगे बढ़ जाना सही साबित होने से ज़्यादा ज़रूरी होता है।
उम्र बढ़ने के साथ लोग कम नहीं सीखते, बल्कि बहुत सी चीज़ें छोड़ना सीखते हैं।
बेकार की तुलना।
अनावश्यक चिंता।
हर समय खुद को साबित करने की आदत।
हर किसी को खुश रखने की कोशिश।
और जब ये बोझ थोड़ा-थोड़ा उतरने लगता है, तब साँस लेना भी आसान लगने लगता है।
ज़िंदगी शायद उतनी जटिल नहीं है जितनी हमने बना ली है।
कई बार खुशी किसी बड़ी उपलब्धि में नहीं, बल्कि शाम की चाय में होती है।
किसी पुराने दोस्त की हँसी में होती है।
घर लौटने पर किसी अपने के पूछने में होती है, "दिन कैसा रहा?"
लेकिन इन छोटी चीज़ों की कीमत अक्सर हमें तब समझ आती है जब वे हमारे पास नहीं रहतीं।
इसलिए शायद सबसे समझदारी की बात यही है कि जो आज हमारे पास है, उसे सिर्फ़ सामान्य मानकर न गुज़ार दें।
क्योंकि जिन पलों को हम आज साधारण समझ रहे हैं, हो सकता है कल वही हमारी सबसे खूबसूरत यादें बन जाएँ।
No comments:
Post a Comment