Thursday, June 18, 2026

कुंती महाभारत की उपेक्षित किंतु महान नायिका

 कुंती महाभारत की उपेक्षित किंतु महान नायिका



हाल ही में बेंगलुरु के कब्बन पार्क स्थित राज्य केंद्रीय पुस्तकालय में #लेखक_सुशील_कुमार की पुस्तक "महाभारत के नारी पात्र : कुंती" पढ़ने का अवसर मिला। 


पुस्तक पढ़ते समय मुझे ऐसा लगा मानो मैं महाभारत के एक ऐसे चरित्र के निकट पहुँच रही हूँ, जिसके जीवन का दर्द, त्याग, संघर्ष, धैर्य और मातृत्व अक्सर अन्य प्रमुख पात्रों की छाया में दब जाता है। इस पुस्तक ने मुझे कुंती को केवल पांडवों की माता के रूप में नहीं, बल्कि एक असाधारण स्त्री के रूप में देखने की प्रेरणा दी।


महाभारत में त्याग और बलिदान की चर्चा होते ही सबसे पहले भीष्म पितामह का स्मरण होता है। पिता की इच्छा पूर्ण करने के लिए लिया गया उनका आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत भारतीय इतिहास के महानतम त्यागों में गिना जाता है। नारी पात्रों में गांधारी के समर्पण और द्रौपदी के संघर्ष की चर्चा भी व्यापक रूप से होती है। इन सभी पात्रों का महत्व निर्विवाद है, किंतु इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मेरी दृष्टि में कुंती का चरित्र भी उतना ही महान, गहन और विचारणीय प्रतीत होता है। मुझे लगता है कि कुंती के त्याग, उनके अंतर्द्वंद्व और मातृत्व की पीड़ा पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है।


कुंती का मूल नाम पृथा था। वे राजा शूरसेन की पुत्री थीं। बाद में उन्हें राजा कुंतिभोज ने गोद लिया, जिसके कारण वे कुंती कहलायीं। महर्षि दुर्वासा की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिव्य मंत्र का वरदान प्राप्त हुआ था। जिज्ञासावश जब उन्होंने उस मंत्र का प्रयोग किया, तब सूर्यदेव प्रकट हुए और उनसे एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसे हम कर्ण के नाम से जानते हैं। किंतु सामाजिक मर्यादाओं और परिस्थितियों के कारण उन्हें अपने नवजात पुत्र को त्यागना पड़ा। एक माँ के लिए अपने ही पुत्र को स्वयं से दूर कर देना कितना पीड़ादायक रहा होगा, इसकी कल्पना भी मन को व्यथित कर देती है। मेरे विचार से यही वह क्षण था, जहाँ से कुंती के जीवन का मौन संघर्ष प्रारम्भ हुआ।


इसके बाद उनका विवाह हस्तिनापुर के राजा पांडु से हुआ। किंतु नियति ने यहाँ भी उनका साथ नहीं दिया। पांडु को प्राप्त श्राप के कारण वे संतान उत्पन्न नहीं कर सकते थे। तब कुंती ने अपने वरदान का उपयोग कर धर्मराज से युधिष्ठिर, वायु देव से भीम और इंद्र देव से अर्जुन को प्राप्त किया। उन्होंने अपने वरदान को अपनी सहपत्नी माद्री के साथ भी साझा किया, जिससे नकुल और सहदेव का जन्म हुआ। इस प्रकार वे पाँचों पांडवों की माता बनीं।


पांडु की मृत्यु के बाद कुंती के जीवन का संघर्ष और अधिक कठिन हो गया। पांडु की दूसरी पत्नी माद्री ने स्वयं को उनके साथ सती कर लिया और अपने दोनों पुत्रों नकुल और सहदेव का दायित्व भी कुंती को सौंप दिया। उस क्षण से कुंती केवल तीन पुत्रों की नहीं, बल्कि पाँचों पांडवों की माँ बन गईं। उन्होंने कभी अपने और माद्री के पुत्रों में कोई भेदभाव नहीं किया। पाँचों बच्चों को समान स्नेह, संस्कार और संरक्षण देना उनके महान मातृत्व का प्रमाण है।


पुस्तक पढ़ते हुए मुझे यह अनुभव हुआ कि कुंती केवल त्याग की प्रतिमा नहीं थीं, बल्कि अद्भुत साहस, धैर्य और दूरदर्शिता की भी प्रतीक थीं। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपने पुत्रों को संभाला, उन्हें धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की शिक्षा दी तथा हर संकट में उनका मार्गदर्शन किया। लाक्षागृह का षड्यंत्र हो, वनवास की कठिनाइयाँ हों या राजसत्ता के संघर्ष—हर परिस्थिति में कुंती एक दृढ़ शक्ति बनकर खड़ी रहीं।


महाभारत के युद्ध से पूर्व कर्ण को उसके जन्म का सत्य बताने वाला प्रसंग मुझे सबसे अधिक भावुक और मार्मिक लगा। एक ओर उनका मातृत्व था, जो अपने खोए हुए पुत्र को पहचान देना चाहता था, और दूसरी ओर उनका कर्तव्य था, जो अपने अन्य पुत्रों की रक्षा चाहता था। यह द्वंद्व किसी भी माँ के लिए असहनीय हो सकता है। फिर भी कुंती ने जीवन भर अपने व्यक्तिगत सुखों से अधिक अपने कर्तव्यों को महत्व दिया।


मेरी दृष्टि में भीष्म का त्याग प्रतिज्ञा का त्याग था, गांधारी का त्याग समर्पण का त्याग था, द्रौपदी का संघर्ष आत्मसम्मान का संघर्ष था, किंतु कुंती का त्याग मातृत्व का त्याग था। उन्होंने अपने जीवन में एक नहीं, अनेक बार स्वयं को पीछे रखा। कभी पुत्र के वियोग को सहा, कभी पति को खोया, कभी संघर्षों में अपने बच्चों को बचाया और कभी अपने हृदय की पीड़ा को संसार से छिपाकर रखा। यही कारण है कि उनका चरित्र मुझे महाभारत के सबसे संवेदनशील और महान पात्रों में से एक प्रतीत होता है।


मुझे लगता है कि इतिहास अक्सर उन लोगों को अधिक याद रखता है जिनके संघर्ष दिखाई देते हैं, लेकिन कुंती का संघर्ष मौन था। उन्होंने न तो अपने दुःखों का प्रदर्शन किया और न ही अपने त्याग का बखान। वे जीवन भर अपने कर्तव्य का निर्वाह करती रहीं। यही मौन शक्ति उन्हें असाधारण बनाती है।


इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मेरे मन में यह विचार और दृढ़ हुआ कि महाभारत को केवल युद्ध, राजनीति और वीरता के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि कुंती जैसी स्त्रियों के मौन संघर्ष, त्याग और बलिदान के माध्यम से भी समझा जाना चाहिए। यदि भीष्म त्याग के प्रतीक हैं, यदि गांधारी समर्पण की प्रतीक हैं और यदि द्रौपदी साहस की प्रतीक हैं, तो निस्संदेह कुंती मातृत्व, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा की सर्वोच्च प्रतीक हैं।


निष्कर्षतः, मेरी दृष्टि में कुंती महाभारत की सबसे संवेदनशील, साहसी, संघर्षशील और त्यागमयी स्त्रियों में से एक हैं। वे केवल पांडवों की माता नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में आदर्श मातृत्व, धैर्य, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा की जीवंत प्रतिमा हैं। इस पुस्तक ने मुझे उनके व्यक्तित्व को एक नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा दी और उनके प्रति सम्मान को और अधिक गहरा किया। महाभारत की चर्चा जब भी हो, कुंती के मौन बलिदान और संघर्ष को भी उतनी ही श्रद्धा और गंभीरता से स्मरण किया जाना चाहिए।



No comments:

Post a Comment