Sunday, June 28, 2026

काम को दबाओगे, तो पाखंड पैदा होगा

 काम को दबाओगे, तो पाखंड पैदा होगा


जब आचार्य रजनीश ने "संभोग से समाधि तक" की बात की, तब लोगों ने कहा —

"यह आदमी धर्म को भ्रष्ट कर रहा है।"


लेकिन आज दशकों बाद भी सवाल वहीं खड़ा है:


यदि काम-वृत्ति को दबाने की शिक्षा इतनी सफल थी,

तो फिर हर कुछ महीनों बाद कोई न कोई बाबा, गुरु, पुजारी, संत, धर्माधिकारी, पादरी या धार्मिक नेता यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग, धोखाधड़ी या सत्ता के दुरुपयोग में क्यों पकड़ा जाता है?


समस्या व्यक्ति नहीं है।


समस्या वह मानसिकता है जो मनुष्य को सिखाती है कि—


"काम पाप है।"

"इच्छा पाप है।"

"शरीर पाप है।"


और फिर उसी दबे हुए ज्वालामुखी के ऊपर धर्म का सिंहासन रख देती है।


दबी हुई कामना मरती नहीं है।


वह ध्यान में परिवर्तित नहीं होती।


वह भीतर अंधेरे में चली जाती है और फिर किसी दिन विकृति बनकर फूट पड़ती है।


कभी शोषण बनकर।


कभी बलात्कार बनकर।


कभी ब्लैकमेलिंग बनकर।


कभी सत्ता के दुरुपयोग बनकर।


और तब पूरा समाज चिल्लाता है—


"एक और बाबा पकड़ा गया!"


लेकिन सवाल यह है कि पकड़ा कौन गया?


एक व्यक्ति?


या हजारों वर्षों से चला आ रहा वह विचार, जिसने मनुष्य को उसके स्वाभाविक अस्तित्व के खिलाफ खड़ा कर दिया?


आचार्य रजनीश कहते थे—


"जिससे तुम भागते हो, वही तुम्हारा मालिक बन जाता है।"


काम से भागोगे तो काम तुम्हारा पीछा करेगा।


क्रोध से भागोगे तो क्रोध तुम्हें भीतर से खाएगा।


लोभ को दबाओगे तो वह और गहरा होगा।


अंधकार को नकारने से प्रकाश पैदा नहीं होता।


उसे समझने से होता है।


आज भी लाखों लोग किसी न किसी गुरु के पीछे इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई दूसरा उनकी मुक्ति कर देगा।


लेकिन मुक्ति किसी गुरु के चरणों में नहीं है।


मुक्ति अपने भीतर की सच्चाई को देखने में है।


जब तक धर्म का अर्थ दमन रहेगा,


तब तक पाखंड पैदा होगा।


जब तक आध्यात्मिकता का अर्थ इच्छाओं के खिलाफ युद्ध रहेगा,


तब तक विकृतियाँ जन्म लेंगी।


और जब तक मनुष्य को उसके शरीर, उसकी चेतना और उसकी ऊर्जा को समझना नहीं सिखाया जाएगा,


तब तक नए-नए चेहरे बदलेंगे,


नए-नए बाबा आएंगे,


नए-नए घोटाले होंगे,


लेकिन कहानी वही रहेगी।


समस्या किसी एक बाबा की नहीं है।


समस्या उस सोच की है जो मनुष्य को समझने की बजाय उसे दबाने की कोशिश करती है।


जिस दिन धर्म दमन नहीं, समझ बन जाएगा...


उस दिन शायद मंदिर भी पवित्र होंगे,


आश्रम भी पवित्र होंगे,


और मनुष्य भी।

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