लड़कियां प्रेम से नहीं, प्रेम चोपड़ों से डरती हैं
लड़कियां प्रेम से क्यों डरती हैं? इस सवाल का जवाब किसी मनोवैज्ञानिक की किताब में नहीं मिलेगा। इसका जवाब आपको उन पुरुषों के व्यवहार में मिलेगा जो प्रेम को प्रेम नहीं, अपनी उपलब्धि समझते हैं। जो किसी स्त्री के साथ बिताए गए निजी पलों को अपने अहंकार की ट्रॉफी बना कर बाजार में टांग देते हैं। जो यह मान बैठते हैं कि अगर कोई स्त्री कभी उनसे प्रेम कर बैठी थी, तो उसकी स्मृतियों पर भी उनका मालिकाना हक है।
मुझे याद है, एक बार मैंने धर्मेंद्र से मीना कुमारी का जिक्र कर दिया था। उन्होंने बात को बहुत सम्मान से टाल दिया। कहा था कि संजय सिन्हा जी, अब रहने दीजिए, वो बहुत अच्छी अभिनेत्री थीं, उनके साथ अच्छी यादें हैं। बस। ऐसे ही मैंने एक बार अमिताभ बच्चन से परवीन बाबी का नाम लिया था। वो कुछ क्षण चुप रहे। फिर धीरे से बोले, हां, परवीन जी। और उसके बाद खामोश हो गए।
उस दिन मुझे लगा था कि प्रेम की सबसे बड़ी भाषा शायद मौन ही होती है। प्रेम अगर सचमुच प्रेम रहा हो तो उसमें प्रदर्शन नहीं होता। उसमें नीलामी नहीं होती। उसमें पुराने संदेशों, तस्वीरों और निजी पलों का हिसाब नहीं रखा जाता। प्रेम कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं है। प्रेम दो लोगों के बीच की वह नदी है, जिसे दुनिया की नजरों से बचाकर बहने दिया जाता है।
लेकिन फिर आप ललित मोदी जैसे लोगों को देखते हैं।
एक समय देश के सबसे ताकतवर लोगों में गिने जाने वाले ललित मोदी। धन, दौलत, प्रभाव, शोहरत सब कुछ था। लेकिन आदमी की असली पहचान तब होती है जब उसका अहंकार घायल होता है। और तब जो बाहर निकलता है, वही उसका चरित्र होता है।
आज वह बार-बार सुष्मिता सेन का नाम लेकर, उनके साथ की तस्वीरें दिखाकर, पुराने संबंधों की चर्चा करके आखिर साबित क्या करना चाहते हैं? कौन सा सम्मान बढ़ रहा है? किसका कद ऊंचा हो रहा है? कौन सी महानता प्रकट हो रही है?
असल में यह प्रेम की कहानी नहीं है। यह घायल हुए अहंकार की कहानी है।
जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ बिताए निजी पलों को सार्वजनिक करता है, तो वह दुनिया को यह नहीं बता रहा होता कि उसने प्रेम किया था। वह दुनिया को यह बता रहा होता है कि वह प्रेम के योग्य नहीं था।
प्रेम में सबसे बड़ा गुण विश्वास होता है। और विश्वास का मतलब यही होता है कि रिश्ता खत्म हो जाए, रास्ते अलग हो जाएं, बातचीत बंद हो जाए, फिर भी जो बातें दो लोगों के बीच थीं, वे दो लोगों के बीच ही रहें। जो तस्वीरें निजी थीं, वे निजी रहें। जो स्मृतियां थीं, वे स्मृतियां ही रहें। उन्हें हथियार न बनाया जाए।
लेकिन कुछ लोग प्रेम नहीं करते, संग्रह करते हैं। वे रिश्ते नहीं जीते, सबूत जमा करते हैं। और जब रिश्ता खत्म होता है तो वे उन सबूतों को लहरा-लहरा कर दुनिया को बताते हैं कि देखो, कभी यह स्त्री मेरे साथ थी।
इससे बड़ी दरिद्रता क्या होगी?
सोचिए, अगर हर स्त्री को यह डर हो कि आज जो वो प्रेम पत्र लिख रही है, कल वही आदमी उन पत्रों को सोशल मीडिया पर डाल देगा। आज जो तस्वीर वह विश्वास में भेज रही है, कल वही तस्वीर उसकी बेइज्जती का माध्यम बन जाएगी। आज जो बात वह अपने दिल की गहराइयों से कह रही है, कल वही बात किसी इंटरव्यू या पोस्ट का मसाला बन जाएगी। तब कौन लड़की निडर होकर प्रेम करेगी?
पुरानी फिल्मों में खलनायक प्रेम पत्रों को पब्लिक कर देने धमकी देता था। कहता था कि सबके सामने पढ़ दूंगा। लड़की कांप जाती थी। हमें लगता था कि यह सिर्फ फिल्मों की कहानी है। लेकिन समय ने दिखा दिया कि फिल्मों के खलनायक मरते नहीं, सिर्फ उनके कपड़े बदल जाते हैं।
आज प्रेम चोपड़ा स्क्रीन पर नहीं है, लेकिन उसकी मानसिकता जिंदा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब हाथ में प्रेम पत्र नहीं, मोबाइल फोन है। अब मोहल्ले की चौपाल नहीं, सोशल मीडिया है। अब फुसफुसाहट नहीं, वायरल पोस्ट हैं।
और फिर समाज हैरान होता है कि लड़कियां खुलकर प्रेम क्यों नहीं करतीं? क्यों डरती हैं? क्यों अपने रिश्तों को छिपाती हैं? क्यों हर समय आशंकित रहती हैं?
वे इसलिए डरती हैं क्योंकि उन्होंने बार-बार देखा है कि प्रेम में हारने वाला पुरुष अक्सर गरिमा नहीं बचाता। वह बदला लेता है। वह अपमानित करता है। वह यह साबित करने में लग जाता है कि अगर वह स्त्री उसकी नहीं हुई, तो कम से कम उसकी निजता भी सुरक्षित नहीं रहेगी।
ललित मोदी का मामला सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है। यह उस मानसिकता का आईना है जो प्रेम को साझेदारी नहीं, स्वामित्व समझती है। जो स्त्री को इंसान नहीं, उपलब्धि समझती है। जो यह मानती है कि किसी महिला के साथ जुड़ जाना उसके जीवन पर स्थायी अधिकार प्राप्त कर लेना है।
नहीं, प्रेम ऐसा नहीं होता।
प्रेम में अगर कुछ बचता है तो सम्मान बचता है। अगर कुछ मरना चाहिए तो अहंकार मरना चाहिए। अगर कुछ दफन होना चाहिए तो निजी बातें दफन होनी चाहिए। प्रेम खत्म हो सकता है, लेकिन प्रेमिका की गरिमा खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं मिलता।
इसलिए जब कोई आदमी अपने पुराने प्रेम का ढिंढोरा पीटता है, तो वह अपनी प्रेम कहानी नहीं सुना रहा होता। वह अपने चरित्र का पोस्टमार्टम कर रहा होता है। और दुनिया देख रही होती है कि अंदर कितना खोखलापन है।
संजय सिन्हा का मानना है कि लड़कियां प्रेम से नहीं डरतीं। लड़कियां प्रेम के नाम पर मिलने वाले विश्वासघात से डरती हैं। वे उस दिन से डरती हैं जब कोई पुराना प्रेमी उनकी मुस्कान, उनकी तस्वीर, उनके संदेश और उनकी यादों को अपने घायल अहंकार की राख में झोंक देगा।
और सच पूछिए तो डरना भी चाहिए।
प्रेम में धोखा खाने से बड़ा दुख दूसरा नहीं होता, लेकिन प्रेम के बाद अपमानित किए जाने से बड़ी क्रूरता भी नहीं होती। प्रेम का अंत बिछड़ने से हो जाए तो भी ठीक है, लेकिन उसका अंत किसी ललित मोदी की फेसबुक पोस्ट में हो, प्रेम (सिर्फ फिल्मी कहानी तक- कटी पतंग) की हंसी में हो, इससे बड़ा दुर्भाग्य किसी स्त्री के हिस्से में क्या आएगा?
प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा साथ रहना नहीं है। प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा एक-दूसरे की गरिमा की रक्षा करना है। जो यह नहीं कर सकता, उसने प्रेम किया ही नहीं था। उसने सिर्फ अपने अहंकार को प्रेम का नाम दे रखा था।
नोट-
प्रेम में सबसे सुंदर शब्द ‘मैं तुमसे प्यार करता हूं’ नहीं है।
सबसे सुंदर शब्द है ‘तुम निश्चिंत रहो।’
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