Sunday, May 31, 2026

प्रेम कोई संबंध नहीं, बल्कि एक अवस्था है

 "प्रेम कोई संबंध नहीं, बल्कि एक ऐसी अवस्था है जहाँ तुम्हारा अस्तित्व ही प्रेम बन जाता है।


ओशो कहते हैं, तुमने प्रेम को हमेशा दो के बीच की चीज समझा। मेरा-तेरा, पति-पत्नी, दोस्त-दुश्मन। ये प्रेम नहीं, सौदा है। इसमें माँग है, अपेक्षा है, भय है। आज है, कल टूट जाएगा।


संबंध का मतलब है ‘दो के मध्य’। जहाँ दो हैं, वहाँ बाजार है। तुम देते हो तो चाहते हो कि लौटे। तुम कहते हो ‘मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ’, पर भीतर आवाज है ‘तुम भी करो’। ये प्रेम नहीं, लेन-देन है।


ओशो कहते हैं: असली प्रेम संबंध नहीं, तुम्हारी अवस्था है। जैसे दीया जलता है तो रोशनी बिखरती है। दीया ये नहीं पूछता कि रोशनी किस पर गिरे। फूल खिलता है तो सुगंध लुटाता है। सुगंध का कोई पता नहीं होता।


जब तुमसे ‘मैं’ गिर जाता है, जब अहंकार का पत्थर हटता है, तब भीतर से प्रेम का झरना फूटता है। फिर तुम प्रेम करते नहीं, तुम प्रेम हो जाते हो।


तब तुम्हें प्रेम करने के लिए किसी की जरूरत नहीं रहती। अकेले बैठे हो तो भी प्रेम में हो। वृक्ष को देखो तो प्रेम, आकाश को देखो तो प्रेम, दुश्मन को देखो तो भी प्रेम। क्योंकि अब तुम प्रेम बहा रहे हो, माँग नहीं रहे।


संबंध टूट सकते हैं, अवस्था नहीं टूटती। व्यक्ति बदल जाएँ, पर तुम्हारा प्रेम नहीं बदलता। क्योंकि वो अब तुम्हारा स्वभाव है।


यही ओशो का इशारा है: प्रेम को खोजो मत, प्रेम हो जाओ। फिर मंदिर-मस्जिद जाने की जरूरत न रहेगी। तुम जहाँ खड़े हो जाओगे, वहीं तीर्थ बन जाएगा।

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