साधना का महाताप: भ्रम से ब्रह्म की ओर
जब शरीर का ज्वर (बुखार) दिमाग तक पहुँच जाता है, तो वह मर्ज़ विज्ञान की पहुँच से भी बाहर हो जाता है और व्यक्ति पागलपन की अवस्था में आ जाता है। ऐसे में स्वयं विचार करो—जब तुम सामान्य ज्वर के एक छोटे से ताप को भी झेल नहीं पाते, तब उस 'महाताप' यानी महाशक्ति कुंडलिनी रूपी ऊर्जा को जाग्रत करने की बात करते हो! अब यह ज्ञान का विषय है या हँसी का, इसका निर्णय तुम स्वयं करो।
आंतरिक युद्ध और विज्ञान का नियम
जिस प्रकार यदि कोई हानिकारक तत्व इस शरीर में फैलने लगे, जिससे शरीर रोगी होने लगे और आंतरिक प्रणाली दूषित हो, तो वहाँ एक प्राकृतिक प्रक्रिया स्वतः शुरू हो जाती है। एक तरफ वह तत्व है जो बीमारी फैला रहा है, और दूसरी तरफ हमारी आंतरिक प्रणाली है जो उस रोग या विषाणु से लड़ रही है; जिसे विज्ञान प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) कहता है।
जब इन दोनों के बीच युद्ध होता है, तो इस क्रिया के फलस्वरूप कुछ भौतिक लक्षण (Symptoms) प्रकट होते हैं। इनमें मुख्य है "ज्वर" अर्थात बुखार, जो स्वयं में एक ताप है। यह ताप हर उस समय प्रकट होता है जब हमारी आंतरिक सुरक्षा प्रणाली लड़ने के लिए सक्रिय होती है। और वह कब सक्रिय होती है? जब उसे आभास होता है कि कोई बाहरी तत्व तंत्र को बिगाड़ने का प्रयास कर रहा है।
साधना: 'मैं' बनाम 'मैं' की जंग
ठीक इसी प्रकार की लड़ाई तब होती है, जब कोई अपने मन अथवा नाड़ियों में जमी दूषित ऊर्जा से लड़ने का संकल्प कर लेता है। इसी प्रक्रिया को दूसरे शब्दों में "साधना" का नाम दिया जाता है। यहाँ लड़ाई किसी बाहरी शत्रु से नहीं, बल्कि तुम्हारे और तुम्हारे ही बीच होती है—एक सम्मोहन रूपी 'मैं' (अहंकार) और दूसरा शाश्वत 'मैं' (आत्मा)। यहाँ इंद्रियों और अति-इंद्रियों के बीच आंतरिक रूप से एक ऐसा महायुद्ध प्रारंभ होता है, जिसमें स्वीकार और अस्वीकार रूपी दो नावें निरंतर गति करती रहती हैं।
यदि क्रोध और तुम्हारे बीच जंग हो; यदि काम और तुम्हारे बीच जंग हो; यदि तुम्हारे अहंकार और सत्य के बीच जंग हो, तो इसे तुम क्या कहोगे? स्वयं विचार करना।
अति-इंद्रिय शक्ति और प्राकृतिक रूपांतरण
इस आंतरिक संघर्ष से जो महाऊर्जा प्रकट होती है, उसे ही अति-इंद्रिय शक्ति कहते हैं। यदि यह प्रक्रिया प्राकृतिक और सही मार्गदर्शन में हो, तो साधक के भीतर कुछ विशेष लक्षण प्रकट होने लगते हैं, जैसे:
• असीम धैर्य और बर्दाश्त करने की क्षमता।
• भ्रम और माया को सीधे अस्वीकार करने की शक्ति।
• वासना, विषय और विकारों के जाल से मुक्त होकर उन्हें अपने नियंत्रण में करने की सामर्थ्य।
इसी को आध्यात्मिक जीवन की प्रगति और ऊर्ध्वगति के रूप में स्वीकार किया जाता है, जहाँ जीव अनेकों भ्रमों से मुक्त होकर अंततः परमात्मा में विलीन हो जाता है।
अप्राकृतिक प्रयास और माया का जाल
परंतु, यदि इस शक्ति के साथ खेलने का प्रयास किया जाए या अप्राकृतिक तरीके से इसे साधने की ज़िद की जाए, तो इससे निर्मित होने वाले महाताप को मन या इंद्रियाँ सहन नहीं कर पातीं। परिणाम स्वरूप व्यक्ति विक्षिप्त (पागलपन) की अवस्था में आ जाता है।
भ्रम और ब्रह्म की, सत्य और असत्य की इस लड़ाई में, माया से निर्मित हर सम्मोहन उस ताप में भस्म होने लगता है जो साधना की अग्नि से प्रकट होता है। इस ताप से केवल वही सुरक्षित बच पाता है जो पूर्ण निष्ठा, पवित्रता और निष्काम भाव (बिना किसी सांसारिक इच्छा) के साथ इस साधना रूपी अग्नि में उतरता है।
जो लोग किसी कामना या वासना के वश होकर इस अग्नि में कूदते हैं, वे कहीं न कहीं माया का शिकार अवश्य हो जाते हैं—चाहे वे साधना के अंतिम मुकाम पर ही क्यों न हों। इतिहास गवाह है:
• रावण अपने अहंकार के कारण मारा गया।
• बड़े से बड़े तपस्वी काम (वासना) के जाल में उलझ गए।
• शुक्राचार्य जैसे ज्ञानी क्रोध के वशीभूत हुए।
इस माया रूपी महाशक्ति के अंतर्गत रहते हुए भी इन्होंने अपने अहंकार वश यह गुमान कर लिया था कि वे इससे मुक्त हो चुके हैं। यही कारण है कि कोई बीच मार्ग में ही अपने द्वारा साधी शक्तियों का शिकार होकर पथभ्रष्ट हो जाता है, तो कोई मानसिक संतुलन खोकर विक्षिप्त अवस्था की चपेट में आ जाता है।
आगे आप स्वयं गौर करना...
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