स्त्री चाहती है कि उसका प्रिय उसकी धड़कनों का लयकार बने...
स्त्री चाहती है
कि उसका प्रिय
उसकी धड़कनों का लयकार बने,
वैसे ही
जैसे चन्द्रमा
समुद्र की ज्वारों को
बिना छुए दिशा देता है।
वह चाहती है,
कोई उसकी रूह के भूगोल को पढ़े,
नदियों, पर्वतों, मरुस्थलों और
अनाम घाटियों से भरे उस मानचित्र को,
जिसे उसने सदियों से
अपने भीतर तह करके रखा है।
वह चाहती है,
कोई उसके भीतर की
उस आकाशगंगा तक पहुँचे,
जहाँ स्मृतियों के असंख्य तारामंडल
धीरे-धीरे प्रकाश बिखेरते हैं,
और हर तारा
किसी अनकहे प्रेम का अवशेष है।
उसका मन
कभी सहारा के रेगिस्तान-सा विस्तृत हो जाता है,
जहाँ प्रतीक्षा
धूप की तरह तपती है,
और वह चाहती है
कि उसका प्रिय
पहली वर्षा बनकर उतरे,
जिसकी एक बूंद से भी
रेत में छिपे बीज जाग उठें।
उसका हृदय
किसी महासागर के अथाह गर्त जैसा है,
जहाँ प्रकाश भी
पूरी तरह नहीं पहुँच पाता,
और वह चाहती है
कि कोई गोताखोर नहीं,
एक प्रकाश-पिंड बनकर उतरे,
जो अंधकार से युद्ध नहीं करे,
बस उसे आलोकित कर दे।
वह चाहती है
कि उसका प्रिय
उसके भीतर के खगोल को समझे—
कौन-सा ग्रह विरह है,
कौन-सा नक्षत्र आशा,
कौन-सी धूमकेतु-सी स्मृति
अचानक उसकी आँखों में चमक जाती है।
और जब वे साथ हों,
तो ऐसा लगे
मानो दो आकाशगंगाएँ
अपने-अपने अरबों तारों सहित
धीरे-धीरे एक-दूसरे में विलीन हो रही हों,
बिना किसी टकराव के,
केवल प्रकाश के आदान-प्रदान में।
वह चाहती है
कि उसका प्रिय
उसकी साँसों के सागर में
ज्वार की तरह आए,
और उसकी धड़कनों को
वैसी ही लय दे,
जैसी पृथ्वी को सूर्य देता है,
जैसी चाँद को उसकी कक्षा,
जैसी गंगा को समुद्र का आकर्षण।
क्योंकि स्त्री के लिए प्रेम
किसी विजय का नाम नहीं,
वह तो एक ब्रह्मांड है—
और वह चाहती है
कि उसका प्रिय
उस ब्रह्मांड का सम्राट नहीं,
उसकी आकाशगंगा का सबसे विश्वसनीय तारा बने,
जिसकी रोशनी में
उसकी हर धड़कन
अपना संगीत पहचान सके।
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