पाने से होने तक की यात्रा
मनुष्य का अधिकांश जीवन किसी न किसी चीज़ को पाने की चाह में बीत जाता है। वह सफलता पाना चाहता है, सम्मान पाना चाहता है, प्रेम पाना चाहता है, धन और उपलब्धियाँ पाना चाहता है। परंतु बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि जिस क्षण हम केवल "पाने" के पीछे भागते हैं, हमारी आधी ऊर्जा उसी दौड़ में नष्ट हो जाती है।
हम बिखर जाते हैं।
हमारा ध्यान वर्तमान से हटकर भविष्य की कल्पनाओं में खो जाता है। मन बार-बार सोचता है "मुझे यह कब मिलेगा?", "मैं वहाँ कब पहुँचूँगा?" और इसी बेचैनी में हमारी चेतना अपनी शक्ति खोने लगती है।
लेकिन जैसे ही मनुष्य पाने की यात्रा से निकलकर "होने" की यात्रा पर चल पड़ता है, सब कुछ बदलने लगता है।
वह स्वयं को लक्ष्य के योग्य बनाने लगता है। वह परिणाम के पीछे भागना छोड़ देता है और अपने व्यक्तित्व, अपने कर्म, अपने विचार और अपनी चेतना को उस दिशा में ढालना शुरू कर देता है। तब उसका विज़न केवल एक सपना नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे उसके जीवन की वास्तविकता बनने लगता है।
हालाँकि यह मार्ग आसान नहीं है।
इसके लिए निरंतर प्रयास चाहिए।
इसके लिए अटूट धैर्य चाहिए।
इसके लिए स्वयं पर विश्वास चाहिए।
जब आपका सम्पूर्ण ध्यान एक ही दिशा में केंद्रित हो जाता है जहाँ तन, मन और चेतना एक बिंदु पर आकर मिल जाते हैं तब अद्भुत परिवर्तन शुरू होता है। उस क्षण न अतीत आपको खींचता है, न भविष्य आपको भटकाता है। न भावनाएँ आपको बहा पाती हैं, न संवेदनाएँ आपको विचलित करती हैं।
केवल लक्ष्य और उस तक पहुँचने की साधना शेष रह जाती है।
जब कोई व्यक्ति किसी कार्य में गहराई से उतरने लगता है, तो उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है। वह वही संसार देखता है, पर देखने का उसका नज़रिया बदल जाता है। उसे उन सूक्ष्म बातों का ज्ञान होने लगता है जिन्हें सामान्य दृष्टि कभी नहीं देख पाती।
वह समझने लगता है कि महान निर्माण अचानक नहीं होते।
एक विशाल वृक्ष भी एक छोटे से बीज से जन्म लेता है।
एक विराट नदी भी एक छोटी धारा से निकलती है।
और एक महान व्यक्तित्व भी छोटे-छोटे सतत प्रयासों से बनता है।
तब वह परिणामों की चिंता नहीं करता।
वह केवल अपना कर्तव्य निभाता रहता है।
भारत की भूमि इसी चेतना की भूमि रही है।
यह केवल भौगोलिक रूप से महान नहीं, बल्कि ज्ञान और आत्मबोध की दृष्टि से विश्व का मार्गदर्शक रहा है। यहाँ के ऋषियों, मुनियों और विद्वानों ने ज्ञान को कभी सीमित नहीं किया। उन्होंने उसे समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण मानवता के लिए उपलब्ध कराया।
उन्होंने गुरुकुल बनाए, यात्राएँ कीं, गाँव-गाँव गए और सत्य का प्रकाश फैलाया। उनका उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं था, बल्कि जागृति थी।
वे जानते थे कि संसार का सबसे बड़ा परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर से जन्म लेता है।
क्योंकि लक्ष्य भी आपके भीतर से निकलता है।
आपकी दिशा भी भीतर से तय होती है।
इसलिए बाहरी दुनिया से संघर्ष करने से पहले स्वयं को समझना आवश्यक है।
आप अपनी सोच बदल सकते हैं।
अपनी आदतें बदल सकते हैं।
अपने विश्वास बदल सकते हैं।
और जब ये बदलते हैं, तब आपका पूरा जीवन बदलने लगता है।
लेकिन परिवर्तन केवल सोचने से नहीं आता।
कुछ क्षण आँखें बंद करके बैठ जाना आत्मज्ञान नहीं है।
स्वयं को जानने के लिए स्वयं का अध्ययन करना पड़ता है।
आज से एक छोटा-सा अभ्यास शुरू कीजिए...
दिन भर में सबसे अधिक बोले गए पाँच शब्द लिखिए।
ध्यान दीजिए कि आपके मन में सबसे अधिक कौन-से विचार आते हैं।
किन परिस्थितियों में आप असहज होते हैं।
किन बातों से आपको सच्ची खुशी मिलती है।
जब यह सब आपके सामने कागज़ पर होगा, तब आप स्वयं को पहली बार स्पष्ट रूप से देख पाएँगे।
यदि आपके शब्द नकारात्मक हैं, उन्हें बदलना शुरू कीजिए।
यदि कोई दृश्य, कोई समाचार, कोई व्यक्ति या कोई वातावरण आपको भीतर से अशांत करता है, उससे दूरी बनाइए।
अपने मन को सकारात्मक ध्वनियों से भरिए।
मंत्र सुनिए।
संगीत सुनिए।
प्रेरणादायक विचारों का संग कीजिए।
याद रखिए...
हर वस्तु क्षणिक है।
हर विचार क्षणिक है।
हर भावना क्षणिक है।
उन्हें पकड़कर मत बैठिए।
उन्हें आने दीजिए, जाने दीजिए।
जो भी करें, पूरी जागरूकता और सम्पूर्ण समर्पण के साथ करें।
रिश्तों में संवाद बनाए रखिए, क्योंकि मनुष्य अपने आसपास के लोगों से गहराई से प्रभावित होता है।
आप जिस वातावरण में रहते हैं, धीरे-धीरे उसी का स्वरूप धारण करने लगते हैं।
इसलिए अपने वातावरण का चयन सावधानी से कीजिए।
अच्छे लोगों का साथ चुनिए।
अच्छे विचारों का संग चुनिए।
अच्छे कर्मों का मार्ग चुनिए।
और फिर निरंतर आगे बढ़ते रहिए।
प्रयास करते रहिए।
गिरिए, संभलिए, सीखिए और आगे बढ़िए।
लेकिन धैर्य कभी मत छोड़िए।
क्योंकि प्रकृति का नियम है...
बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है,
सूर्योदय को होने में समय लगता है,
और मनुष्य को स्वयं से मिलने में भी समय लगता है।
जिस दिन आप स्वयं को जान लेंगे, उस दिन आपको समझ आएगा कि जीवन का उद्देश्य केवल कुछ पाना नहीं था...
बल्कि अपने श्रेष्ठतम स्वरूप को प्रकट करना था।
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