दुनिया में धर्म की कमी नहीं है। मंदिर हैं, मस्जिदें हैं, गिरजाघर हैं, गुरुद्वारे हैं। प्रार्थनाएँ हो रही हैं, शास्त्र पढ़े जा रहे हैं, पूजा-पाठ हो रहा है। फिर भी मनुष्य के भीतर अशांति बनी हुई है। घरों में तनाव है, पति-पत्नी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं, भाई-भाई के बीच दीवारें खड़ी हो रही हैं, पिता और पुत्र एक-दूसरे को समझ नहीं पा रहे। मित्रता में भी अपेक्षाओं, शिकायतों और अहंकार की हल्की-सी परत चढ़ी हुई है। दुनिया मे युद्ध है।
धर्म जीवन में उपस्थित है, लेकिन उसका स्पर्श अभी मनुष्य के स्वभाव तक पूरी तरह नहीं पहुँचा। प्रार्थना होंठों तक आती है, शास्त्र बुद्धि तक पहुँचते हैं, पर भीतर की प्रकृति वैसी ही बनी रहती है। क्रोध अपने समय पर आता है, भय अपनी जगह बैठा रहता है, मोह अपने ढंग से बाँधता है और अहंकार चुपचाप अपने लिए जगह बनाता रहता है।
इसीलिए मनुष्य स्थान बदलता रहता है, पर अपनी अशांति साथ लेकर चलता है।
कोई तीर्थ जाता है, कोई आश्रम, कोई पहाड़ों की ओर निकल जाता है। कुछ समय के लिए वातावरण बदल जाता है, मन भी हल्का लगता है, लेकिन लौटते ही वही संबंध, वही प्रतिक्रियाएँ, वही पुराने संस्कार सामने आ खड़े होते हैं।
मन से बाहर निकलकर मन से मुक्ति नहीं मिलती।
जब तक चेतना के भीतर परिवर्तन नहीं आता, तब तक बाहर का संसार चाहे जितना बदल जाए, जीवन की मूल धारा वैसी ही बनी रहती है।
यहीं से चेतना के क्रमिक विकास की यात्रा दिखाई देती है।
यह कोई नया विचार नहीं है। मनुष्य के भीतर यह यात्रा अनादि काल से चलती आई है। जैसे बीज अपने भीतर वृक्ष की संभावना लेकर चलता है, वैसे ही मनुष्य अपने भीतर चेतना की अनेक सीढ़ियाँ समेटे हुए है। धीरे-धीरे उसके भीतर देखने की दृष्टि बदलती है, फिर समझ बदलती है, फिर भाव बदलते हैं और एक दिन वही परिवर्तन उसके पूरे जीवन के ढंग में उतरने लगता है।
साधना की दिशा अब केवल समाधि तक पहुँचने की नहीं, समाधि की शांति को जीवन में उतारने की भी है।
अपने भीतर कृष्ण को अनुभव करना एक बात है और उस कृष्ण को अपने मन, बुद्धि, भावनाओं, इन्द्रियों, प्राण और शरीर में उतार देना दूसरी बात।
क्रोध उठे और भीतर कोई ऐसा स्थान हो जहाँ कृष्ण मौन खड़े रहें।
अपमान मिले और प्रतिक्रिया से पहले करुणा की एक साँस भीतर से उठे।
अहंकार स्वयं को सही सिद्ध करने लगे और चेतना उसे पहचान ले।
भय आए और उसके पीछे छिपे असुरक्षित मन को प्रेम छू ले।
अपने किसी प्रिय से मतभेद हो और संबंध जीतने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाए।
यहीं आध्यात्मिकता जीवन का हिस्सा बनती है।
ईश्वर को पाने के लिए संसार से दूर चले जाना एक राह रही है। मगर ईश्वर की अनुभूति लेकर उसी संसार में लौटना और अपने स्वभाव को बदलते हुए जीना यह भी उतनी ही गहरी साधना है।
गुफा में मौन रहना कठिन हो सकता है, लेकिन अपने ही घर में किसी प्रिय के कठोर शब्द सुनकर भीतर प्रेम को जीवित रखना शायद उससे भी कठिन साधना है।
संसार छोड़ देना एक बात है; संसार के बीच रहते हुए अपनी प्रकृति को दिव्यता के लिए खोल देना दूसरी बात।
इसीलिए समाधि और मोक्ष के आगे भी एक संभावना दिखाई देती है चेतना को जीवन में उतारने की संभावना।
मोक्ष केवल स्वयं के बंधन से मुक्त हो जाने तक सीमित न रहे। भीतर जो प्रकाश मिला है, वह व्यवहार में दिखाई दे। वह बोलने के ढंग में आए, संबंधों में आए, क्रोध के क्षणों में आए, स्पर्श में आए, मौन में आए।
तब धर्म पूजा के कमरे में बंद नहीं रहता।
वह रसोई में दिखाई देता है, जहाँ कोई बिना शिकायत के दूसरे के लिए भोजन बनाता है।
वह पति-पत्नी के बीच दिखाई देता है, जहाँ दोनों अपनी-अपनी जीत से अधिक संबंध को बचाना सीखते हैं।
वह पिता और पुत्र के बीच दिखाई देता है, जहाँ पीढ़ियों के अंतर के बावजूद सुनने की जगह बची रहती है।
वह दो भाइयों के बीच दिखाई देता है, जहाँ पुरानी चोटों के ऊपर प्रेम धीरे-धीरे अपना हाथ रख देता है।
और तब भीतर का कृष्ण किसी मूर्ति में ही नहीं, जीवन के छोटे-छोटे व्यवहारों में दिखाई देने लगता है।
आज संसार जिस परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है, शायद उसकी शुरुआत भी यहीं से होगी।
बहुत से लोग बिना किसी घोषणा के भीतर की इस यात्रा पर हैं। वे अपने मन को देख रहे हैं, अपनी प्रतिक्रियाओं को समझ रहे हैं, अपनी भावनाओं के साथ बैठना सीख रहे हैं। वे अपने भीतर जिस कृष्ण को खोज रहे हैं, उसे धीरे-धीरे अपनी प्रकृति में उतारने का प्रयत्न कर रहे हैं।
यह संसार से भागने की यात्रा नहीं है।
यह संसार में एक नई चेतना के साथ लौटने की यात्रा है।
अपने भीतर के ईश्वर को केवल जानना नहीं उसे जीना।
अपने भीतर के कृष्ण को केवल देखना नहीं उन्हें अपने मन, बुद्धि, प्राण, शरीर और संबंधों में उतरने देना।
मनुष्य की अगली यात्रा वहीं से आरम्भ होती है, जहाँ साधना और जीवन के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।
जहाँ प्रार्थना समाप्त होकर आचरण बन जाती है।
जहाँ ध्यान आँखें बंद करने तक नहीं रहता, बल्कि आँखें खुली हों तब भी भीतर वही शांति बनी रहती है।
और जहाँ ईश्वर को पाने के लिए जीवन से दूर जाने की आवश्यकता नहीं रहती
जीवन ही धीरे-धीरे ईश्वर के उतरने का स्थान बन जाता है।
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