ठहराव...
ठहराव का अर्थ रुक जाना नहीं है। ठहराव का अर्थ है अपने भीतर की उस यात्रा में प्रवेश करना, जहाँ बाहरी संसार का शोर धीरे-धीरे शांत हो जाता है और मनुष्य अपने ही अस्तित्व के तंत्र को समझने लगता है। यह निष्क्रियता नहीं, बल्कि चेतना की सर्वोच्च सक्रियता है।
जब मैं नॉर्थ बंगाल यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रहा था, तब मेरे कुछ मित्र मुझे मज़ाक में "दिमाग का डॉक्टर" कहा करते थे। कारण यह था कि मैं अक्सर उनके मन की बातों को समझ लेता था। उनकी परिस्थितियों, भावनाओं और संघर्षों को देखकर उन्हें सलाह देता था। उस समय यह केवल एक स्वाभाविक संवेदनशीलता थी, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि शायद वही मेरी यात्रा का प्रारंभ था।
एम.ए. पूरा करने के बाद जीवन का वास्तविक अध्याय शुरू हुआ। एक ऐसा अध्याय, जिसमें सफलता से अधिक असफलताओं का सामना करना पड़ा। यद्यपि सफलता और असफलता के अपने-अपने पैमाने होते हैं, फिर भी सच यह है कि मुझे हर मोड़ पर संघर्ष ही अधिक मिला।
मैंने जीवन में जो भी किया, पूरे मन से किया। प्रेम किया तो उसमें पूरी तरह डूब गया। कभी भावनाओं का उफान मुझे कबीर सिंह जैसा बना देता, तो कभी राहुल जयकर की तरह टूटकर भी प्रेम करना सिखाता। आंदोलनों में हिस्सा लिया, संघर्ष किए, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। क्रोध इतना प्रबल था कि कई बार मोबाइल, टीवी और अन्य वस्तुएँ तोड़ दीं। लोगों से भिड़ गया। पागलपन ऐसा कि स्वयं को ही भूल बैठा।
फिर धीरे-धीरे व्यवसाय, नौकरी, आंदोलन एक-एक करके मन से उतरते चले गए। लेकिन खोज समाप्त नहीं हुई। भीतर की यात्रा जारी रही।
मनुष्य का स्वभाव भी विचित्र है। जिसे वह एक बार पूरी तरह छोड़ देता है, उसे फिर उसी दृष्टि से नहीं देख पाता। यह केवल मेरे साथ नहीं, हम सबके साथ होता है।
इन सबके बीच एक कार्य ऐसा था जो कभी नहीं छूटा बच्चों को पढ़ाना। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, दिल्ली और अनेक स्थानों पर बच्चों के साथ काम करने का अवसर मिला। हर क्षेत्र, हर समुदाय और हर बच्चे ने मुझे कुछ नया सिखाया। साथ ही चाय बागानों के श्रमिकों की समस्याओं को लेकर सामाजिक आंदोलनों से भी जुड़ता रहा।
राजस्थान में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर कार्य करने का अवसर मिला। वहीं से ध्यान के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ी। मैंने अनेक पद्धतियों से ध्यान का अभ्यास किया, परंतु लंबे समय तक कुछ स्पष्ट नहीं हुआ। मैं खोजता रहा।
फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने जीवन की दिशा ही बदल दी।
एक गहरा ठहराव मिला।
ऐसा लगा मानो पहली बार जीवन स्वयं को प्रकट कर रहा हो। समझ में आया कि जीवन कहीं भविष्य में नहीं है, न ही अतीत की स्मृतियों में। जीवन केवल इस क्षण में है। इसी श्वास में, इसी अनुभव में, इसी उपस्थिति में।
उस दिन के बाद बहुत कुछ बदल गया। अब क्रोध करने के लिए भी अभिनय करना पड़ता है। मन के भीतर जो निरंतर उथल-पुथल चलती रहती थी, वह शांत होने लगी।
फिर मैंने चिंतन किया कि भारत को कभी विश्वगुरु क्यों कहा जाता था।
उत्तर मिला "शिक्षा।
ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं। जिस समाज के पास जितना अधिक ज्ञान होगा, उसका विकास उतना ही व्यापक होगा। ज्ञान केवल सूचना नहीं देता, वह ऐसा सामाजिक ढाँचा निर्मित करता है जिसमें व्यवस्था स्वयं संचालित होने लगती है। जहाँ ज्ञान नहीं होता, वहाँ भय, असुरक्षा और भ्रम जन्म लेते हैं।
यहीं से मेरा ध्यान बच्चों की शिक्षा और ध्यान-साधना को जोड़ने की दिशा में गया। मेरे मन में प्रश्न उठा यदि बच्चों को शिक्षा के साथ ध्यान भी सिखाया जाए, तो क्या होगा?
परिणाम आश्चर्यजनक रहे।
सिर्फ छह महीनों में बच्चों में अविश्वसनीय परिवर्तन दिखाई देने लगे। जबकि वे प्रतिदिन केवल लगभग डेढ़ घंटे के लिए मेरी शाम की पाठशाला में आते हैं। परिस्थितियाँ अत्यंत चुनौतीपूर्ण हैं। गरीबी है, संसाधनों का अभाव है, कई बार बच्चों को नशीले पदार्थ खरीदने तक भेजा जाता है। परिवार अपनी कठिनाइयों के कारण उन पर उतना ध्यान नहीं दे पाते जितना देना चाहिए।
फिर भी बच्चों के भीतर संभावनाओं का एक विराट संसार है।
यदि उन्हें उचित वातावरण और संसाधन मिल जाएँ, तो वे अद्भुत आविष्कार कर सकते हैं। क्योंकि वे अभी उस प्रक्रिया को समझ रहे हैं जिसमें मनुष्य स्वयं को खोजता है। वही प्रक्रिया जिसने किसी कलाकार को कलाकार बनाया, किसी वैज्ञानिक को वैज्ञानिक और किसी विचारक को विचारक।
मेरा उद्देश्य बच्चों पर कोई विचार थोपना नहीं है। मेरा प्रयास केवल इतना है कि वे अपनी क्षमताओं को स्वयं पहचान सकें। और इसके लिए उन्हें गलतियाँ करने की स्वतंत्रता चाहिए। क्योंकि गलतियाँ भी शिक्षक होती हैं।
यदि किसी बच्चे को किसी मशीन को तोड़कर दोबारा बनाने की स्वतंत्रता दी जाए, तो वह केवल मशीन नहीं सीखता, वह सृजन सीखता है। निर्माण का आनंद सीखता है। लेकिन इसके लिए उसके भीतर भय नहीं होना चाहिए।
ठहराव ने मुझे यही सिखाया है कि जब मन शांत होता है, तब सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है।
एक समय मैंने सोचा था कि जीवनयापन के लिए राजनीतिक दलों के लिए रणनीति बनाने का कार्य करूँगा। व्यवसाय में दो बार प्रयास किया, धन की हानि हुई। लेकिन आज उन सबके प्रति कोई विशेष आकर्षण नहीं बचा।
अब चाह की तलाश समाप्त हो चुकी है।
मेरा कर्म ही मेरा फल है।
मन एक ऐसे शून्य में स्थित है जहाँ सब कुछ समाया हुआ है, और वहीं से एक जागरूकता उत्पन्न होती है जो हर क्षण मुझे मेरे कर्म के प्रति सचेत करती है। मैं केवल देखता हूँ, समझता हूँ और अपना कार्य करता जाता हूँ।
मेरे ध्यान का अर्थ है अपने प्रत्येक कर्म को अधिक सजगता, अधिक समझ और अधिक पूर्णता के साथ करना।
यदि आप खेल रहे हैं, तो केवल खेलिए।
यदि आप विश्राम कर रहे हैं, तो केवल विश्राम कीजिए।
यदि आप अपने परिवार के साथ हैं, तो पूर्ण रूप से उनके साथ रहिए।
कल की चिंता और बीते हुए कल का बोझ वर्तमान के सौंदर्य को नष्ट कर देता है। जो बीत चुका है उसे कोई शक्ति वापस नहीं ला सकती, और जो आने वाला है वह अपने समय पर आएगा।
जीवन केवल इसी क्षण में है।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अपने मित्रों द्वारा दिया गया "मन का डॉक्टर" नाम याद आता है। शायद वे अनजाने में उस दिशा की ओर संकेत कर रहे थे जहाँ मुझे पहुँचना था।
"शिक्षा मन को प्रकाश देती है, ध्यान मन को शांति देता है, और जब प्रकाश तथा शांति एक साथ मिलते हैं, तभी मनुष्य स्वयं को पहचान पाता है।"
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