Monday, June 1, 2026

शायद स्त्रियाँ प्रेम से नहीं देखे जाने से डरती हैं

 शायद स्त्रियाँ प्रेम से नहीं देखे जाने से डरती हैं


यह बात अजीब लगेगी।


लेकिन शायद बहुत-सी स्त्रियाँ प्रेम से नहीं डरतीं।


वे पूरी तरह देखे जाने से डरती हैं।


क्योंकि प्रेम में हम अपना सुंदर चेहरा दिखा सकते हैं।


अपनी हँसी दिखा सकते हैं।


अपनी समझदारी दिखा सकते हैं।


अपनी कोमलता दिखा सकते हैं।


लेकिन देखे जाने का अर्थ है कि कोई हमारे भीतर उन जगहों तक भी पहुँच जाए जहाँ हम स्वयं कभी नहीं जाते।


वह जगह जहाँ ईर्ष्या रहती है।


जहाँ क्रोध रहता है।


जहाँ वह बच्ची रहती है जो आज भी किसी के लौट आने की प्रतीक्षा कर रही है।


जहाँ वह स्त्री रहती है जो बाहर से बहुत मज़बूत दिखती है लेकिन कभी-कभी रात के दो बजे यह सोचकर रो पड़ती है कि अगर वह सबको संभालना बंद कर दे तो क्या कोई उसे संभालेगा?


शायद इसी कारण कई लोग प्रेम नहीं करते।


वे प्रेम का अभिनय करते हैं।


अभिनय सुरक्षित होता है।


उसमें हम अपने संवाद चुन सकते हैं।


अपनी छवि नियंत्रित कर सकते हैं।


अपने घावों पर पर्दा डाल सकते हैं।


लेकिन वास्तविक निकटता खतरनाक होती है।


वह हमारी बनाई हुई कहानी को तोड़ देती है।


वह पूछती है....


तुम कौन हो, जब कोई तुम्हारी प्रशंसा नहीं कर रहा होता?


तुम कौन हो, जब कोई तुम्हें चाह नहीं रहा होता?


तुम कौन हो, जब तुम्हारे सारे रिश्ते, सारी भूमिकाएँ, सारी पहचानें एक-एक करके तुमसे छीन ली जाएँ?


और यहीं अधिकांश लोग रुक जाते हैं।


क्योंकि उन्होंने जीवन में बहुत कुछ खोया है, लेकिन कभी अपनी पहचान खोने का साहस नहीं किया।


शायद इसलिए कुछ स्त्रियाँ बार-बार ऐसे लोगों की ओर आकर्षित होती हैं जो उन्हें कभी पूरी तरह नहीं मिलते।


क्योंकि अधूरा प्रेम सुरक्षित होता है।


उसमें कल्पना जीवित रहती है।


उसमें दूरी बची रहती है।


उसमें स्वयं को पूरी तरह खोलने की आवश्यकता नहीं पड़ती।


कई बार हम किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं करते।


हम उस दूरी से प्रेम करते हैं जो हमें स्वयं से बचाए रखती है।


और यह बात जितनी क्रूर है, उतनी ही सच्ची भी।


क्योंकि मनुष्य का सबसे बड़ा भय अकेलापन नहीं है।


उसका सबसे बड़ा भय है...


एक दिन स्वयं से मिल लेना।


बिना किसी कहानी के।


बिना किसी बहाने के।


बिना किसी भूमिका के।


और देख लेना कि भीतर वास्तव में कौन रहता है।


शायद उपचार का अर्थ खुश हो जाना नहीं है।


शायद उपचार का अर्थ पहली बार अपने भीतर बैठे उस अजनबी के साथ बैठ पाना है, जिससे हम पूरी ज़िंदगी बचते रहे।


और जिस दिन यह संभव हो जाता है, उसी दिन प्रेम बदल जाता है।


फिर वह किसी खालीपन को भरने का साधन नहीं रहता।


वह दो पूर्ण लोगों के बीच घटित होने वाली एक दुर्लभ घटना बन जाता है।


जहाँ कोई किसी को बचाने नहीं आता।


कोई किसी को पूरा करने नहीं आता।


दो लोग बस एक-दूसरे की उपस्थिति में स्वयं होने का साहस करते हैं।


और शायद यही संसार की सबसे दुर्लभ निकटता है।ध्यान दीजिए, यह "खुद से प्रेम करो" वाला लेख नहीं है। यह एक असहज प्रश्न उठाता है:


"क्या हम सच में प्रेम चाहते हैं, या हम केवल इतना चाहते हैं कि कोई हमें चाहे?"

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