Monday, June 1, 2026

रिश्तों की खुशबू को पहचानिए

 रिश्तों की खुशबू को पहचानिए, अकेलेपन की बदबू से बचिए


कमा चुके? घर-मकान, जमीन जायदाद जुटा चुके? गोल्ड में निवेश कर चुके। पेट भर चुका या नहीं? बच्चों को पढ़ा लिया न?


सब कर चुके ये अच्छी बात है। अब ध्यान दीजिएगा, जीने के क्रम में आप कहीं थोड़ा स्वार्थी तो नहीं हो गए? संघर्ष के दिनों की व्यस्तता में कहीं आपको ऐसा तो नहीं लगा कि जो हैं, आप ही हैं, जो व्यस्तता है आपके पास ही है। और आपकी इस यात्रा में कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि आप अकेले पड़ गए और आपको पता भी नहीं चला।


जब पता चला तब तक देर हो चुकी थी। आपने शहर का संताप जिया। आपने सुबह से रात तक काम किया। आपने बच्चों के लिए किया, अपने लिए किया, अपने भविष्य के लिए किया। करते-करते आपको लगने लगा कि दौलत ही ईश्वर है। पर उस ईश्वर को पाने की साधना में आपने कहीं बहुत कुछ खो तो नहीं दिया? 


कहीं दोस्त तो नहीं छूट गए, रिश्तेदार पीछे तो नहीं रह गए, पड़ोसी ने मुंह तो नहीं मोड़ लिया? 


पहले जिन लोगों के घर आप बिना बताए चले जाते थे, अब उनके फोन आने पर भी आपको समय नहीं मिलता था। फिर बच्चे बड़े हुए, पढ़े, आगे बढ़े और बाहर चले गए। उनका दोष भी नहीं था। आपने ही तो उन्हें सिखाया था कि जीवन में अवसर जहां मिले, वहां चले जाना चाहिए। वे चले गए। आप रह गए। जिंदगी चलती रही।


खैर, संजय सिन्हा आज कोई उपदेश नहीं दे रहे। न ही आपको डराने की कोशिश कर रहे हैं। बस नागपुर से आई एक खबर बतानी थी। आपने पढ़ी भी होगी।


खबर बहुत छोटी है, लेकिन उसके भीतर छिपा हुआ अकेलापन बहुत बड़ा है। नागपुर में एक बुजुर्ग दंपति अपने घर में रहते थे। पति 77 वर्ष के थे। पत्नी 75 वर्ष की थीं और लकवे से पीड़ित थीं। वे पूरी तरह अपने पति पर निर्भर थीं। पति ही उन्हें खाना खिलाते थे, दवा देते थे, उनकी देखभाल करते थे। जीवन के उस पड़ाव पर पहुंच कर दोनों का संसार बहुत छोटा रह गया था। अब उसमें न महत्वाकांक्षाएं बची थीं, न सपने। सिर्फ साथ बचा था।


एक दिन पति रसोई में फिसल गए, सिर में चोट लगी और उनकी मौत हो गई। पत्नी बिस्तर पर जिंदा थीं। उन्हें शायद समझ में आ गया होगा कि कुछ अनर्थ हुआ है। शायद उन्होंने इंतजार किया होगा कि अभी वे रसोई से लौटेंगे। अभी आवाज देंगे। अभी पानी पूछेंगे। लेकिन कोई नहीं आया। क्योंकि जो आने वाला था, वह अब कभी नहीं आने वाला था।


पत्नी बिस्तर से उठ नहीं सकती थीं। चल नहीं सकती थीं। किसी से मदद नहीं मांग सकती थीं। वे सिर्फ अपने कमरे में पड़ी रह सकती थीं। मैं बार-बार सोचता हूं कि उन दिनों में उस महिला ने क्या सोचा होगा? क्या उसे अपने पति की चिंता रही होगी? क्या उसे अपनी चिंता रही होगी? क्या उसे भूख लगी होगी? क्या उसे प्यास लगी होगी? उसे बाथरूम जाना होगा? 


या फिर उम्र के उस मोड़ पर पहुंच कर आदमी सिर्फ एक चीज सोचता है कि काश कोई आ जाए। कोई अपना। कोई परिचित, जिसे यह ख्याल आ जाए कि चलो आज इनका हाल पूछ लें।


कोई नहीं आया। कुछ दिनों बाद भूख, प्यास और भीषण गर्मी में उस महिला के शरीर ने चुपचाप जवाब दे दिया। टुकुर-टुकुर पति के आने की आस में उसकी आंखें पथरा गई। उसकी भी मृत्यु हो गई। पति सिर्फ रसोई से कमरे तक की यात्रा पूरी नहीं कर पाया।


मरना छिपता है क्या? यह बात दुनिया को पता चली. लेकिन कब? जब घर से बदबू उठी। आसपास वालों को संदेह हुआ। दरवाजा तोड़ा गया। अंदर दोनों के शव मिले। सड़े हुए।


मैंने खबर पढ़ी और बहुत देर तक सोचता रहा कि आदमी जीवन भर आखिर क्या कमाता है। पैसा? मकान? जमीन? बैंक बैलेंस? या लोग? क्योंकि अंत में आदमी को रोटी से ज्यादा जरूरत किसी की आवाज की होती है।


अंत में आदमी को पैसे से ज्यादा जरूरत किसी के हाल पूछने की होती है। अंत में आदमी को दवा से ज्यादा जरूरत इस भरोसे की होती है कि अगर वह दो दिन दिखाई नहीं देगा तो कोई दरवाजा खटखटाने आएगा।


फेसबुक पर लोग पूछते हैं कि संजय सिन्हा आप रोज क्यों लिखते हैं? यकीन कीजिए मेरा लिखना सिर्फ लिखना नहीं है। यह हालचाल पूछने का एक तरीका है। यहां लोग सुप्रभात लिखते हैं, नमस्कार लिखते हैं, अपनी बात कहते हैं, दूसरे की बात सुनते हैं। कम से कम एक-दूसरे से जुड़े तो हैं। किसी को किसी की परवाह तो होती है।


दुनिया की हर चीज का मूल्य पैसे से नहीं लगाया जा सकता। कई बार किसी का हाल पूछ लेना भी उतना ही बड़ा काम होता है जितना किसी की आर्थिक मदद कर देना।


इसलिए जुड़े रहिए। संसार के सबसे बड़े इस परिवार (संजय सिन्हा फेसबुक परिवार) से बिना लाभ के जुड़े रहिए। बिना स्वार्थ के जुड़े रहिए। अपना हाल बताने के लिए और दूसरों का हाल पूछने के लिए जुड़े रहिए। 


जिंदगी की शाम तो सबके हिस्से आएगी ही। आपकी भी, मेरी भी। बस इतना ध्यान रखिए कि जब वह शाम आए तो लोगों को एक दूसरे की अनुपस्थिति का पता कमी से चले, घर से उठती बदबू से नहीं।


नोट- 

रिश्तों की खुशबू को पहचानिए। अकेलेपन की बदबू से बचिए। 

यहां रोज आइए। सुप्रभात कहिए, गुड मार्निंग कहिए। अपने दिल की बात कहिए। जो कहने का मन हो, वो कहिए दिल खोल कर। क्या पता किसी एक अकेले को आपका छोटा-सा साथ मिल जाए और वो भी महसूस कर पाए, रिश्तों की खुशबू।


No comments:

Post a Comment