मुझे तुमसे प्रेम है,
पर इस प्रेम में ना कोई ज़िद है,
ना पाने की चाह, ना खोने का डर।
अब तुम पूछोगे ‘फिर ये कैसा प्रेम है...?’
तो सुनो,
ये वो प्रेम है जिसमें
तुम्हारी परवाह हर रोज़ होती है,
तुम्हारी मुस्कान से दिल को सुकून मिलता है,
और तुम्हारे दुःख से आँखें नम हो जाती हैं।
ये वो चाहत है
जिसमें साथ ज़रूरी नहीं,
बस तुम्हारा खुश रहना ज़रूरी लगता है।
मुझे नहीं पता तुम्हारे लिए ये क्या है,
पर मेरे लिए… यही सच्चा प्रेम है।
तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं करना चाहिए था
क्योंकि मैं उन लड़को में से नहीं हूं
जो प्रेम को समय बिताने की चीज़ समझता हैं
मैं तो उसे सांसों की तरह जीता हूं
मैं प्रेम करने वाला नहीं,
प्रेम में पूरी की पूरी उतर जाने वाला लड़का हूं
मैंने तुम्हें चाहा नहीं है सिर्फ़,
मैंने तुम्हें अपने दिनों में बसाया है,
अपनी प्रार्थनाओं में रखा है,
और तुम
मेरे हिस्से का उजाला लेकर भी
मुझे ही प्रेम सिखा रहे
मेरा प्रेम
बहुत सच्चा है
उसमें छल के लिए जगह नहीं है
मैंने तुम्हारे नाम पर
अपने भीतर कितनी नदियां बहाईं
और तुम किनारे पर खड़े
पत्थर बने रहे।
मैं उन लड़को में से हूं
जो प्रेम होने पर
अपना सब कुछ बचाकर नहीं रख पाते
थोड़ा-थोड़ा नहीं
पूरा हृदय दे बैठते हैं
और फिर
खाली होकर भी
उसी एक व्यक्ति से भरे रहते है
जिससे निश्छल, निस्वार्थ, निष्कपट
प्रेम करते हैं......
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