Sunday, June 28, 2026

तुम्हारे आँसुओं का स्वाद

 तुम्हारे आँसुओं का स्वाद


प्रेम में

देह का मिलना भर प्रेम नहीं होता,

प्रेम तो वह क्षण होता है

जब दो आत्माएँ

एक-दूसरे की ख़ामोशियों को भी छू लेती हैं।


तुम्हारी पलकों पर ठहरा

एक अकेला आँसू,

मेरे लिए किसी समंदर से कम नहीं होता।

मैं उसे देखता हूँ

और लगता है जैसे

तुम्हारा पूरा दिल

उस एक बूँद में उतर आया हो।


जब मैं धीरे से

तुम्हारी नम पलकों को चूमता हूँ,

तो आँसू की नमकीनी

मेरे होंठों पर आकर

अचानक मिठास में बदल जाती है।


शायद इसलिए कि

उसमें तुम्हारा भरोसा घुला होता है,

तुम्हारा समर्पण,

तुम्हारा अपनापन,

और वह अनकहा प्रेम

जिसे शब्द कभी पूरा नहीं कह पाते।


तुम्हारे आँसू

मुझे कभी खारे नहीं लगे,

वे तो हमेशा ऐसे लगे

जैसे किसी ने

चाँदनी को पिघलाकर

एक बूँद में भर दिया हो।


मैंने देखा है,

जब तुम भावुक होकर चुप हो जाती हो,

तब तुम्हारी आँखें बोलने लगती हैं।

और मैं उन आँखों की भाषा

किसी किताब की तरह पढ़ता हूँ,

धीरे-धीरे,

हर पंक्ति को महसूस करते हुए।


तुम्हारी पलकों की नमी से

मेरे होंठों तक का सफ़र

बहुत छोटा होता है,

लेकिन उस छोटे से सफ़र में

पूरी एक मोहब्बत जी ली जाती है।


क्योंकि प्रेम में

सबसे मीठा स्वाद

होंठों का नहीं,

विश्वास का होता है।


और जब तुम्हारी आँखों से निकली

एक बूँद मेरे होंठों तक पहुँचती है,

तो लगता है जैसे

दुनिया की सारी शक्कर

फीकी पड़ गई हो,


और सिर्फ़ तुम बची हो...


तुम्हारी नमी,

तुम्हारी धड़कन,

तुम्हारा एहसास,


और मेरे होंठों पर ठहरी हुई

तुम्हारे प्रेम की

सबसे मीठी नमकीनी।

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