जैसे जैसे हम बड़े होते हैं कुछ रिश्ते धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं- क्यों? पहले समझ नहीं आता था लेकिन पुराने अनुभवों के आधार पर सोच विचार करते हुए कुछ बातें समझ आईं। समझदारी सबसे बांटनी चाहिए इसीलिए मैं खत्म हुए संबंधों या खत्म कर देने लायक संबंधों की बाबत कुछ बातें बता रही हूँ।
• सबके जीवन में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो तभी संपर्क करते हैं जब उन्हें मदद या किसी चीज़ की ज़रूरत होती है। वे अक्सर मदद मांगते हैं, लेकिन जब मिल जाती है और मुश्किल सुलझ जाती हैं, तो वे बताते भी नहीं शुक्रिया तो बाद की बात है।
ऐसे लोगों की वजह से कई बार लगता है हम इंसान नहीं काम आने वाले साधन भर हैं। अब ऐसे रिश्ते कैसे चल सकते हैं?
• दो लोगों के बीच आपसी फायदे-नुकसान पर टिके संबंध का होना कोई बुरी बात नहीं लेकिन जब उनमें से कोई एक हमेशा सिर्फ़ अपने फ़ायदे की परवाह करता रहे तो?
कुछ लोग रिश्तों को एक कैलकुलेशन की तरह लेते हैं। वे हमेशा सोचते रहते हैं कि उन्हें क्या मिलेगा या क्या खोना पड़ेगा।
यह अहसास कि कोई आपको अपने आस-पास बस इसलिए रखता है ताकि भविष्य में उन्हें कुछ न खोना पड़े। आप इसीलिए हैं कि लाभ पहुंचा सकें तो यह एहसास दिल तोड़ने वाला होता है।
• कुछ लोग तब गायब हो जाते हैं जब आप मुश्किल में होते हैं। जब ज़िंदगी अच्छी चल रही होती है, हर दिन मिलना-जुलना करते हैं। गपशप चाय पानी चलती है पर लेकिन जब मुश्किल समय गुज़रता है तो अचानक कोई मैसेज तक नहीं आता।
मौके पर उनकी चुप्पी आपको उस रिश्ते की ठोस हकीकत बता देती है।
• कुछ लोग जब भी मिलते या फोन करते हैं सिर्फ़ अपने बारे में बात करते हैं। असल में आपको लगता है बातचीत हो रही है लेकिन वास्तव में कोई बातचीत नहीं होती।
आप बस सुनते रहते हैं और वे बार-बार अपने बारे में बताते हैं। एक दिन आपको एहसास होता है कि आप धीरे-धीरे उनका इमोशनल डस्टबिन बन गए हैं या फिर उनकी सफलता असफलता के रिकॉर्ड कीपर या एक खाली कमरा भर बन गए हैं। हो सकता है थोड़े दिनों के लिए आपको अपनी जगह महत्वपूर्ण लगेगी पर आप बस खाली हो जाएंगे।
• कुछ दोस्त होते हैं, आपके लिए दुखी होते हैं पर आपके लिए खुश नहीं हो पाते।
जब आपके जीवन में कुछ अच्छा होता है तो साथ सेलिब्रेट करने की बजाय वे गायब हो जाते हैं या बहुत ही उत्साहहीन प्रतिक्रिया देते हैं।
सोचिए अगर आपकी खुशी किसी और की फ्रस्ट्रेशन में बदल जाती है तो शायद उस रिश्ते को पीछे छोड़ देना ही बेहतर है।
*विशेष* जरूरी नहीं सिर्फ दूसरे लोग ही इस श्रेणी में आते हों, हो सकता है कुछ लोगों के साथ हम भी दूसरी श्रेणी वाले ही हों। काम के वक्त याद करने वाले,लाभ उठाने वाले,सिर्फ अपने बारे में बोलने वाले, मुश्किल में गायब होने वाले या फिर खुशी पर फ्रॉस्टेस्ट होने वाले।
आखिर आप भी इंसान हैं कोई मूरत तो नहीं।
अपने बारे में तटस्थता से सोचना आसान नहीं। पर सोचिए।
हालांकि मैं कितना भी सोचूं इस जीवन में आखिरी कैटेगरी में तो कभी नहीं रही हूँ। चौथे नम्बर वाली बात भी मेरे बारे में सच नहीं हो सकती क्योंकि कहने से अधिक सुनने की आदत है। ईमानदारी से कहूँ तो कुछ जगहों पर ऊपर के तीन प्रकार के लोगों में हो भी सकती हूँ। पर फायदे के लिए संबंध बनाने में जिस कौशल की जरूरत होती है वह भी कम आता है, दुख के वक्त कटना भी कम सीखा, हां कई बार पीछे जाती हूँ क्योंकि बहुत से लोग सामने हों तो खुद को पृष्ठभूमि में डाल देना ठीक लगता है। फिर भी शुरू के तीन में मैं भी हो सकती हूँ परंतु मुझे पाँचों तरह के लोग मिले हैं।
और देर से ये बातें समझ आईं हैं। अब लगता है बची हुई जिंदगी में खुद के लिए समय को बचाना है तो ऐसे लोगों से बचना ही चाहिए।
लिख इसीलिए रही हूँ इसे पढ़ते हुए आपको भी कुछ अनुभव संचित ज्ञान मिले। अगर यह आपकी बात भी है तो आप निर्णय तक पहुंच सकें।
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