मन एक बच्चा है… ध्यान उसका खिलौना। 🔥
सुनो साधको…
घर में जब छोटा बच्चा बहुत शरारत करता है,
रोता है, चीजें फेंकता है,
माँ को काम नहीं करने देता…
तो माँ क्या करती है?
वह उसे प्रेम से एक खिलौना दे देती है। 🧸
और कहती है —
“लो बेटा… इसके साथ खेलो…”
बस फिर क्या…
बच्चा खिलौने में खो जाता है।
और माँ शांति से घर का काम करने लगती है।
अब कोई रुकावट नहीं।
कोई शोर नहीं।
घर में सहजता उतर आती है। 🌺
साधको…
ठीक यही तुम्हारे भीतर भी हो रहा है। ⚡
यह शरीर एक घर है।
तुम्हारी चेतना उस घर की माँ है।
और मन, अहंकार, इच्छाएँ —
ये सब एक शरारती बच्चे की तरह हैं। 👁️
मन हर समय कुछ न कुछ मांगता है।
कभी क्रोध…
कभी वासना…
कभी चिंता…
कभी तुलना…
कभी भविष्य…
कभी अतीत…
मन लगातार उछलता रहता है।
और जब तक यह उछलता रहता है,
भीतर की चेतना को अवसर नहीं मिलता।
इसलिए ऋषियों ने ध्यान दिया। 🕉️
ध्यान कोई धर्म नहीं।
ध्यान कोई कर्मकांड नहीं।
ध्यान मन रूपी बच्चे को दिया गया दिव्य खिलौना है। ✨
जब मन ध्यान में लग जाता है…
तो भीतर शांति उतरने लगती है।
विचार धीरे-धीरे शांत हो जाते हैं।
अहंकार की दौड़ रुकने लगती है।
और तब…
तुम्हारी चेतना,
जो अब तक मन के शोर में दब गई थी,
वह जागने लगती है। 🔥
फिर अस्तित्व तुम्हारे माध्यम से काम करता है।
फिर जीवन में सहजता आती है।
फिर तुम्हारी असली नियति प्रकट होती है।
याद रखना —
जिस दिन मन शांत हो गया,
उसी दिन परमात्मा को तुम्हारे भीतर कार्य करने का अवसर मिल गया। 🌼
ध्यान का अर्थ है —
मन को इतना शांत कर देना
कि भीतर बैठी चेतना
अस्तित्व की सेवा कर सके।
और जब चेतना सक्रिय होती है…
तो साधारण मनुष्य भी प्रकाश बन जाता है।
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