Friday, June 26, 2026

सूफ़ी की चादर में छुपा प्रेम

 सूफ़ी की चादर में छुपा प्रेम....


सुनो...


मैं तुम्हें वैसे नहीं चाहता जैसे कोई प्यासा नदी को चाहता है,


मैं तुम्हें वैसे चाहता हूँ जैसे कोई दरवेश बरसों से अपने रब की एक झलक चाहता है।


तुम्हारा नाम


मेरे लिए कोई शब्द नहीं,


वह तो एक ऐसा ज़िक्र है जिसे मैं अपनी साँसों की तस्बीह पर हर रोज़ दोहराता हूँ।


कभी-कभी लगता है,


मैं कोई सूफ़ी हूँ और तुम वह रहस्य जो मेरी फटी हुई चादर के भीतर सदियों से छुपा रखा गया है।


तुम्हें पाने की नहीं,


तुममें खो जाने की इच्छा है।


जैसे शाम धीरे-धीरे रात में घुल जाती है,


जैसे चाँदनी झील की सतह पर उतरकर अपनी अलग पहचान भूल जाती है।


वैसे ही मैं भी


तुम्हारे स्मरण में अपना समूचा अस्तित्व खो देना चाहता हूँ।


सुनो प्रिय,


प्रेम कभी-कभी नमाज़ की आख़िरी दुआ जैसा होता है।


होंठ कुछ नहीं कहते,


पर रूह सजदे में पड़ी रहती है।


मैंने तुम्हें हथेलियों से कम,


अपनी प्रार्थनाओं से अधिक छुआ है।


तुम्हारी स्मृति


मेरे भीतर ऐसे बहती है जैसे किसी खानकाह में रात भर जलता हुआ दीया।


धीमा...


मगर अनश्वर।


कभी तुम मिलीं तो लगा,


जैसे फिरदौस का कोई दरवाज़ा क्षण भर के लिए खुल गया हो,


और मैं उस रोशनी को देखकर अपने सारे अँधेरे भूल गया हूँ।


तुम्हारी आँखों में मुझे कई जन्मों की यात्राएँ दिखती हैं,


और तुम्हारी मुस्कान में


वह सुकून,


जिसकी तलाश में सूफ़ी रेगिस्तानों से लेकर दरगाहों तक भटकते हैं।


यदि प्रेम का कोई रंग है,


तो वह तुम्हारे नाम का है।


यदि प्रेम की कोई ख़ुशबू है,


तो वह उस चादर की है जिसमें मैंने अपने समस्त विरह, अपनी समस्त कामनाएँ, और अपना समूचा समर्पण बाँध रखा है।


और यदि कभी मेरी रूह से पूछा जाए,


कि उसने इस संसार में सबसे पवित्र चीज़ क्या देखी,


तो वह कहेगी—


"एक प्रेम था...


जो किसी सूफ़ी की चादर में छुपा रहा,


और फिर भी पूरे ब्रह्मांड में महकता रहा...

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