Friday, June 26, 2026

मैं कैसे कह दूँ मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं

 मेरी देह तुम्हारी नवजात उँगलियों का स्पर्श चाहती है,

मैं कैसे कह दूँ मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं।


जैसे सदियों से सूखी धरती

पहले सावन के बादल को पुकारती है,


जैसे किसी उजड़े हुए बाग़ में

एक फूल फिर से खिलने की ज़िद करता है,


वैसे ही मेरा अस्तित्व

तुम्हारी उपस्थिति की आहट चाहता है।


तुम्हें क्या पता,


कितनी बार मैंने

अपने भीतर की खामोशियों को समझाया है


कि प्रेम केवल स्मृति से भी जी लिया जाता है,


मगर हर बार

मन की देहरी पर बैठी एक स्त्री


तुम्हारे नाम का दीप जला देती है।


मैं कोई संगमरमर की मूर्ति नहीं,


जिसे स्पर्श और प्रतीक्षा में अंतर न मालूम हो।


मैं तो वह नदी हूँ


जो अपने सागर का नाम सुनते ही


अपने किनारों तक में कंपन महसूस करने लगती है।


मेरी त्वचा पर लिखी हुई ऋतुएँ


तुम्हारे स्नेह की धूप चाहती हैं,


मेरी साँसों में अटकी हुई अनगिनत दुआएँ


तुम्हारे निकट होने का अर्थ जानना चाहती हैं।


तुम्हारा होना


मेरे लिए वैसा ही है


जैसे अजंता की किसी अधूरी चित्रकथा को


उसका अंतिम रंग मिल जाना,


जैसे किसी बाँसुरी को


भटकती हवाओं में अपना राग मिल जाना।


और मैं कैसे कह दूँ


कि मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं—


जब मेरी हर धड़कन


तुम्हारे नाम का एक छोटा-सा तीर्थ है,


जब मेरे भीतर बैठी स्त्री


अब भी तुम्हारी प्रतीक्षा ऐसे करती है


जैसे चाँदनी


रात के आँगन में उतरने से पहले


झील का पता पूछती हो।


तुम आओ तो ऐसे आना


जैसे कोई दरवेश


बरसों की इबादत के बाद


अपने रब की चौखट तक पहुँचा हो,


और मैं तुम्हें ऐसे सँभाल लूँ


जैसे कहकशाँ


अपने सबसे प्रिय सितारे को सँभालती है।


क्योंकि कुछ ज़रूरतें शब्दों से नहीं कही जातीं,


वे बस आँखों में ठहर जाती हैं—


और प्रेम उन्हें पढ़ लेता है।॥

No comments:

Post a Comment