"रिश्तों की सबसे खामोश मृत्यु"
कहते हैं,
रिश्ते झगड़ों से टूटते हैं।
मैंने देखा है
झगड़े तो कई रिश्तों को बचा भी लेते हैं,
क्योंकि जहाँ शिकायत बची होती है,
वहाँ उम्मीद भी बची होती है।
मगर कुछ रिश्ते
बिना किसी शोर के मर जाते हैं।
इतनी खामोशी से,
कि घर के दरवाज़े तक नहीं जान पाते
कि भीतर कोई रिश्ता अभी-अभी दम तोड़ गया है।
"मृत्यु हमेशा चिताओं पर नहीं होती,"
कुछ मौतें
रसोई में रोटियाँ सेंकते हुए होती हैं,
कुछ चाय के कप के साथ,
कुछ "कैसा दिन रहा?" पूछना बंद हो जाने के बाद।
और कुछ तब,
जब कोई पहली बार
अपना दुख कहने जाता है
और लौट आता है
अपने ही भीतर।
"वह लड़की"
जो पहले घंटों बोलती थी,
अपने दिन की हर छोटी-बड़ी बात सुनाती थी,
एक दिन अचानक चुप नहीं हुई थी।
उसकी चुप्पी
वर्षों की यात्रा करके आई थी।
पहले उसकी बातों पर हँसी उड़ी,
फिर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताना कहा गया,
फिर उसकी संवेदनाओं को कमजोरी बताया गया।
और एक दिन
उसने महसूस किया
उसकी आवाज़
उसके अपने ही घर में
अनचाही हो चुकी है।
उस दिन उसने बोलना नहीं छोड़ा,
उस दिन उसने उम्मीद छोड़ दी।
"और वह पुरुष,"
जिसे बचपन से सिखाया गया था
"मर्द रोते नहीं।"
वह जब पहली बार टूटा था,
तब उसने आँसू नहीं रोके थे,
उसने अपना पूरा व्यक्तित्व रोक लिया था।
उसने सीखा था
कि दर्द छुपाना सम्मान है।
कमज़ोरी दिखाना हार है।
और फिर वह एक दिन
अपने ही रिश्ते में
एक पत्थर की तरह रहने लगा।
बाहर से मज़बूत,
भीतर से चूर-चूर।
कितना अजीब है न?
हम दुनिया भर के लोगों के सामने
खुद बन सकते हैं,
मगर कभी-कभी
जिसे सबसे अपना कहते हैं,
उसी के सामने
सबसे ज़्यादा अभिनय करना पड़ता है।
"एक दिन ऐसा आता है"
जब तुम कुछ कहना चाहते हो,
फिर सोचते हो
"रहने दो।"
और सच मानो,
रिश्तों का अंत
"अलविदा" से नहीं होता।
रिश्तों का अंत
इसी "रहने दो" से शुरू होता है।
रहने दो,
उसे समझ नहीं आएगा।
रहने दो,
फिर वही बहस होगी।
रहने दो,
मेरी बात का मतलब बदल दिया जाएगा।
रहने दो,
मैं ही गलत ठहरा दिया जाऊँगा।
और धीरे-धीरे
यह "रहने दो"
दिल के हर कमरे में फैल जाता है।
फिर वहाँ बातें नहीं रहतीं,
सिर्फ औपचारिकताएँ बचती हैं।
तुम साथ बैठते हो,
मगर संवाद नहीं होता।
तुम एक ही बिस्तर पर सोते हो,
मगर सपने अलग-अलग देख रहे होते हो।
तुम एक ही घर में रहते हो,
मगर अपने दुख
अलग-अलग कोनों में जाकर रोते हो।
कभी किसी ने पूछा है
कि इंसान सबसे ज़्यादा अकेला कब होता है?
जब उसके पास कोई न हो?
नहीं।
इंसान सबसे ज़्यादा अकेला तब होता है
जब उसके पास कोई हो,
फिर भी वह अपने मन की बात
उससे न कह सके।
वह अकेलापन
समुद्र से भी बड़ा होता है।
उसमें कोई लहर नहीं उठती,
कोई तूफ़ान नहीं आता,
बस धीरे-धीरे
जीवन की सारी आवाज़ें डूब जाती हैं।
कई बार लोग कहते हैं,
"हमारे बीच सब ठीक है।"
और मैं सोचता हूँ
क्या सचमुच?
क्या अब भी तुम
अपने डर बता सकते हो?
क्या अब भी तुम
अपनी मूर्खताएँ स्वीकार सकते हो?
क्या अब भी तुम
बिना डरे रो सकते हो?
क्या अब भी तुम
अपनी असफलताएँ रख सकते हो
उस व्यक्ति के सामने
जो तुम्हें सबसे अधिक जानता है?
अगर नहीं,
तो शायद कुछ टूट चुका है।
और टूटना हमेशा आवाज़ नहीं करता।
मैंने देखा है,
कुछ लोग घर छोड़कर नहीं जाते,
वे बस अपने भीतर चले जाते हैं।
इतना भीतर,
कि वर्षों बाद भी
कोई उन्हें वापस नहीं ला पाता।
उन्होंने रिश्ता नहीं छोड़ा होता,
उन्होंने सिर्फ़
अपना असली चेहरा छुपा लिया होता है।
वे मुस्कुराते हैं,
मगर पूरी मुस्कान नहीं होती।
वे बात करते हैं,
मगर पूरा सच नहीं होता।
वे साथ रहते हैं,
मगर पूरा मन नहीं होता।
और फिर एक दिन,
जब दुनिया पूछती है
"आख़िर हुआ क्या था?"
तो उनके पास कोई उत्तर नहीं होता।
क्योंकि
जो चीज़ उन्हें तोड़ रही थी,
वह दिखाई ही नहीं देती थी।
न कोई धोखा,
न कोई बड़ा अपराध,
न कोई तूफ़ान।
बस
हर बार थोड़ा-थोड़ा अनसुना किया जाना।
हर बार थोड़ा-थोड़ा गलत समझा जाना।
हर बार थोड़ा-थोड़ा अकेला छोड़ दिया जाना।
और अंततः
एक दिन
दिल ने सीख लिया
अब यहाँ सुरक्षित नहीं हूँ।
शायद प्रेम का सबसे सुंदर अर्थ
यह नहीं कि कोई तुम्हारे लिए मर जाए।
शायद प्रेम का सबसे सुंदर अर्थ यह है
कि कोई तुम्हारे सामने
पूरी तरह जीवित रह सके।
अपनी हँसी के साथ,
अपने डर के साथ,
अपने घावों के साथ,
अपनी असफलताओं के साथ।
जहाँ उसे हर भावना का प्रमाण न देना पड़े।
जहाँ उसे हर आँसू का कारण न बताना पड़े।
जहाँ उसे हर बार यह साबित न करना पड़े
कि उसका दर्द सच है।
क्योंकि प्रेम का घर
ईंटों से नहीं बनता।
विश्वास से भी नहीं।
उससे भी पहले
वह एक अदृश्य मिट्टी पर खड़ा होता है
जिसका नाम है
भावनात्मक सुरक्षा।
और जब यह मिट्टी सूख जाती है,
तो महलों जैसे रिश्ते भी
अंदर से दरकने लगते हैं।
धीरे-धीरे।
खामोशी से।
बिना किसी घोषणा के।
फिर एक दिन
दो लोग आमने-सामने बैठे होते हैं,
और उनके बीच
सिर्फ़ एक सवाल बचता है
"हम इतने दूर कब हो गए?"
मगर उस सवाल का उत्तर
किसी एक दिन में नहीं छुपा होता।
वह छुपा होता है
उन सैकड़ों दिनों में,
जब किसी ने दिल खोला था
और बदले में
समझे जाने की जगह
निर्णय पाया था।
याद रखना,
रिश्तों की सबसे बड़ी ज़रूरत प्रेम नहीं है।
प्रेम तो कई जगह मिल जाता है।
सबसे दुर्लभ चीज़ है
किसी के सामने
बिना डर के
अपना मन रख पाना।
और जहाँ यह मिल जाए,
वहीं घर है।
वहीं प्रेम है।
वहीं वह जगह है
जहाँ आत्मा
अपने जूते उतारकर बैठ सकती है।
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