Sunday, June 14, 2026

हमने एक-दूसरे को खो दिया

 हमने एक-दूसरे को खो दिया


मैं, तुम्हारी आँखों में ठहरना चाहती थी उस आख़िरी नमी की तरह जो बरसात के बाद भी पलकों पर बनी रहती है।


तुम, मेरे भीतर उतरना चाहते थे उस ख़ुशबू की तरह जो किसी भीगे हुए मौसम में देह से नहीं, रूह से उठती है।


मगर हुआ क्या...


मैं अपनी झिझकों में लिपटी रही, तुम अपने अहंकार में।


तुम मुझे पढ़ते रहे जैसे कोई अधूरी किताब,


और मैं तुम्हें छूती रही अपने ख़्यालों में किसी अधूरी दुआ की तरह।


कई रातें ऐसी थीं जब तुम्हारा नाम मेरे तकिए पर बिखरे बालों में उलझा रहा,


और कई रातें ऐसी भी जब मेरी याद तुम्हारी करवटों में जागती रही होगी।


हम दोनों के बीच कुछ अनकहे स्पर्श थे,


कुछ अधूरी प्यासें,


कुछ ऐसे आलिंगन जो कभी घटित नहीं हुए, फिर भी उनकी स्मृति हमारे बीच मौजूद रही।


तुम्हें मुझमें एक ऐसी स्त्री चाहिए थी जो तुम्हारे सारे मौसमों में ढल जाए,


और मुझे तुममें एक ऐसा पुरुष चाहिए था जिसकी बाँहों में मैं अपने सारे भय उतार सकूँ।


मगर हम दोनों एक-दूसरे को पाने से ज़्यादा एक-दूसरे को बदलने में लगे रहे।


और इसी कोशिश में


तुम्हारे होंठों तक पहुँचने से पहले मेरी चाहत थक गई,


मेरी देह तक पहुँचने से पहले तुम्हारा प्रेम।


अब जब विदा का समय है,


तो अफ़सोस इस बात का नहीं कि तुम मेरे नहीं हुए,


अफ़सोस इस बात का है कि


हम दोनों ने एक-दूसरे की धड़कनों के दरवाज़े तक पहुँचकर भी दस्तक देना नहीं सीखा।


सुनो,


मैं आज भी मानती हूँ,


अगर तुमने थोड़ा और ठहरना सीखा होता,


और मैंने थोड़ा और खुलना,


तो शायद...


आज हमारी साँसों के बीच इतनी दूरी न होती।


पर अब—


तुम्हें आज़ादी मुबारक,


और मुझे भी...


क्योंकि प्रेम की सबसे बड़ी विडम्बना यही है—


कभी-कभी दो लोग एक-दूसरे को बेहद चाहते हैं,


मगर अपने-अपने "मैं" से बाहर निकलकर एक-दूसरे में समा नहीं पाते।...

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