"भीतर का अनंत"
मेरे भीतर एक सागर है,
जिसकी गहराइयों में
डूबे पड़े हैं अनगिनत कल के दिन,
भूले हुए सपने,
अधूरी पुकारें,
और वे आँसू भी
जिन्हें समय ने चुपके से पत्थर बना दिया।
मैं चलता रहा जीवन की धूप में,
पर मेरे ही कदमों के नीचे
दबी रहीं मेरी परछाइयाँ।
वे पुकारती रहीं मुझे,
और मैं दुनिया के शोर में
उनकी आवाज़ सुन न सका।
मेरे भीतर कुछ घाव थे
जो भरने के बजाय सड़ते रहे,
कुछ डर थे
जो अंधेरों में साँप बनकर पलते रहे,
और कुछ प्रेम थे
जो किसी बंद संदूक में
साँस लेने को तरसते रहे।
फिर एक दिन
मैंने स्वयं के द्वार पर दस्तक दी।
मैं उतरा अपने ही भीतर,
जहाँ स्मृतियों की धूल जमी थी,
जहाँ भूले हुए गीत
अब भी किसी कोने में गूँज रहे थे।
मैंने अपने अंधेरों को छुआ,
और देखा
वे शत्रु नहीं थे,
वे तो केवल प्रकाश के भूखे थे।
तब जाना,
कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय
दुनिया जीतना नहीं,
स्वयं को पहचान लेना है।
और जब भीतर का हर बिखरा हुआ अंश
एक होकर जाग उठता है,
तब चेतना की सीमाएँ टूट जाती हैं।
तब मृत्यु केवल एक दरवाज़ा लगती है,
कमज़ोरी एक बीता हुआ भ्रम,
और बंधन
हवा में उड़ती हुई राख।
उस क्षण
मनुष्य आकाश नहीं देखता,
स्वयं आकाश बन जाता है।
वह किसी शिखर पर नहीं पहुँचता,
बल्कि जान लेता है
जिस अनंत को वह बाहर खोजता रहा,
वह तो उसकी अपनी ही आत्मा की धड़कनों में
सदियों से प्रतीक्षा कर रहा था।
और तब
भीतर का मौन बोल उठता है
"तुम कभी छोटे नहीं थे,
तुम कभी टूटे नहीं थे,
तुम केवल सोए हुए थे।
अब जागो...
क्योंकि तुम्हारे भीतर
एक अनंत सूर्योदय जन्म लेने को है।"
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