जब चाँद ने नदी को छुआ
पुरुष
कोई विजेता नहीं था उस रात,
वह तो बस एक थका हुआ चंद्रमा था जो युगों से अपनी ही रोशनी में अपनी प्रेयसी का चेहरा खोज रहा था।
और स्त्री—
वह कोई देह नहीं थी,
वह पर्वतों से उतरती हुई एक प्राचीन नदी थी, जिसने अपने भीतर हजारों जन्मों की प्यास सँजो रखी थी।
जब वे मिले,
तो ऐसा नहीं था कि दो शरीर एक-दूसरे के निकट आए,
बल्कि ऐसा था जैसे किसी सूफ़ी की अधूरी प्रार्थना को अचानक उसका खुदा मिल गया हो।
पुरुष ने उसकी आँखों में देखा,
और उसे लगा मानो तारों से भरा समूचा आकाश उसकी पलकों के नीचे आकर ठहर गया है।
स्त्री ने उसकी धड़कनों को सुना,
और उसे लगा जैसे किसी निर्जन घाटी में सदियों बाद पहली बार अनहद की धुन गूँजी हो।
वह उसके कंधे पर सिर रखकर धीरे-धीरे पिघलती रही,
जैसे हिमालय की बर्फ गंगा बनने से पहले अपने अस्तित्व को छोड़ रही हो।
और वह—
उसे बाँहों में भरकर वैसे ही काँपता रहा,
जैसे पूर्णिमा का चाँद पहली बार समुद्र के इतने निकट आ गया हो कि उसकी लहरें उसकी रौशनी को छूने लगें।
उस रात
न कोई शब्द था, न कोई वादा।
केवल दो आत्माएँ थीं,
जो एक-दूसरे में वैसे उतर रही थीं
जैसे चाँदनी धीरे-धीरे किसी शांत झील में उतरती है, और झील उसे पीती जाती है बिना कोई लहर उठाए।
सुबह जब समय ने उनके कंधों पर हाथ रखा,
तो दोनों वैसा नहीं रहे जैसे मिलने से पहले थे।
पुरुष के भीतर उसकी खुशबू का एक चंद्रमा उग आया था,
और स्त्री के भीतर उसकी स्मृति की एक नदी बहने लगी थी।
तब से,
हर प्रेम में, हर विरह में,
वह चंद्रमा उसे खोजता है,
और वह नदी अपनी हर लहर में उसकी रोशनी को सँजोए रखती है।
क्योंकि कुछ मिलन देह पर नहीं लिखे जाते,
वे ब्रह्मांड की आत्मा पर लिखे जाते हैं,
और सदियों तक चाँदनी बनकर बहते रहते हैं।॥
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