Friday, June 26, 2026

स्त्री नदी की तरह बहना चाहती है

 प्रेम के मन्त्रमुग्ध क्षणों में

स्त्री नदी की तरह बहना चाहती है—


पर हर नदी समुद्र तक नहीं पहुँचती,


कुछ नदियाँ पहले

शिव की जटाओं में ठहरती हैं।


वह चाहती है कि उसका प्रिय


उसे केवल देखे नहीं,


उसे पढ़े भी—


वैसे ही जैसे कोई साधु

भोर के समय गंगोत्री के तट पर बैठकर

जल की हर लहर में छिपा श्लोक पढ़ता है।


स्त्री का मन कोई रहस्य नहीं,


बस एक तीर्थ है।


चार धाम की यात्रा की तरह,


जहाँ हर पड़ाव पर


श्रद्धा चाहिए,


अधिकार नहीं।


वह चाहती है कि पुरुष


उसकी पीठ पर उँगलियों से


आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींचे,


और वे रेखाएँ


धीरे-धीरे कविता बन जाएँ।


ऐसी कविता


जिसे केवल त्वचा नहीं,


आत्मा भी पढ़ सके।


वह चाहती है


उसकी खामोशियों को


मंदिर की घंटियों की तरह सुना जाए,


क्योंकि कई बार


स्त्री बोलती कम है,


गूँजती अधिक है।


उसके भीतर भी


एक भागीरथी बहती है,


जो वर्षों की तपस्या के बाद


अपने शिव तक पहुँचना चाहती है।


और जब पहुँचती है,


तो नदी नहीं रहती,


प्रार्थना बन जाती है।


प्रेम में स्त्री


सती की तरह समर्पित होती है,


पर समर्पण का अर्थ मिट जाना नहीं,


बल्कि इतना विश्वास करना है


कि अपना सम्पूर्ण मन


किसी की हथेलियों में रख सके।


वह चाहती है


कि पुरुष उसके दुःखों पर


मणिकर्णिका की भभूत मल दे,


ताकि बीते हुए समय की चिताएँ


शांत हो सकें।


वह चाहती है


कि उसके भीतर जो भय जलते हैं,


जो विरह धधकते हैं,


उन सबकी राख़ से


एक नया वसंत जन्म ले।


और तब—


वह नदी की तरह बहेगी,


हवा की तरह छुएगी,


संगीत की तरह गूँजेगी,


और प्रेम


किसी देह का उत्सव नहीं,


दो आत्माओं का संगम लगेगा—


वैसा संगम,


जहाँ गंगा और यमुना मिलकर भी


अपना अस्तित्व नहीं खोतीं,


बल्कि एक-दूसरे को और विशाल बना देती हैं।


यही तो स्त्री चाहती है—


कोई ऐसा पुरुष,


जो उसे बाँधे नहीं,


बल्कि उसकी समूची भागीरथी को


अपने प्रेम के आकाश में


निश्छल होकर बह जाने दे। 

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