दुनिया जैसी है, वैसी ही है
एक बात मैंने समय के साथ समझी है दुनिया हमारे हिसाब से नहीं चलती। हम चाहें कि हर जगह न्याय हो, हर इंसान अच्छा हो, और हर मेहनत का सही फल मिले, लेकिन हक़ीक़त अक्सर इससे अलग होती है।
बारिश जब होती है तो यह नहीं देखती कि किसके खेत में मेहनती किसान खड़ा है और किसके खेत में आलसी। पानी बस बरसता है। अब जिसने पहले से तैयारी की है, उसके खेत को फ़ायदा होगा; जिसने नहीं की, वह नुकसान उठाएगा।
लोग भी कुछ ऐसे ही हैं। कुछ लोग आपके साथ ईमानदारी से पेश आएँगे, तो कुछ सिर्फ़ अपना मतलब देखेंगे। कुछ आपकी मदद करेंगे, तो कुछ मौक़ा मिलने पर आपका इस्तेमाल भी कर सकते हैं। यह सुनने में कड़वा लगता है, लेकिन यही सच है।
समस्या तब शुरू होती है जब हम बार-बार यह सोचकर परेशान होते रहते हैं कि लोग ऐसे क्यों हैं। दुनिया इतनी स्वार्थी क्यों है। फलाँ इंसान ने मेरे साथ गलत क्यों किया।
लेकिन इन सवालों के जवाब ढूँढ़ते-ढूँढ़ते अक्सर हम अपनी ही ताक़त खो देते हैं।
समझदार इंसान हर बुरे आदमी से लड़ने नहीं निकलता। वह यह समझने की कोशिश करता है कि लोग कैसे सोचते हैं, हालात कैसे काम करते हैं और खुद को कैसे बेहतर बनाया जाए। क्योंकि आख़िर में वही सबसे ज़्यादा फ़ायदे में रहता है जो दुनिया को बदलने से पहले खुद को मज़बूत बनाता है।
दीपक अंधेरे से बहस नहीं करता। वह बस जलता है। और जितना ज़्यादा जलता है, उतना ही अंधेरा पीछे हटता जाता है।
ज़िंदगी में भी यही नियम काम करता है। शिकायतें कम और तैयारी ज़्यादा। गुस्सा कम और समझ ज़्यादा। दूसरों को बदलने की कोशिश कम और खुद को बेहतर बनाने की कोशिश ज़्यादा।
क्योंकि सच यह है कि दुनिया में हमेशा अच्छे लोग भी रहेंगे और चालाक लोग भी। लेकिन यह तय करना हमारे हाथ में है कि हम हर बार किसी की चाल का शिकार बनेंगे या इतने समझदार बनेंगे कि कोई हमें आसानी से इस्तेमाल न कर सके।
दुनिया जैसी है, वैसी ही रहेगी। लेकिन हम कैसे बनते हैं, यह फ़ैसला हमेशा हमारा अपना होता है।
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