“अपनी ही आवाज़ से थक जाना”
एक समय के बाद
इंसान को दुनिया से ज्यादा
अपनी ही बातों से थकान होने लगती है।
पहले तुम हर चीज़ बताते हो।
छोटी खुशी भी,
छोटी तकलीफ भी।
लगता है कोई सुनेगा तो हल्का लगेगा।
फिर धीरे-धीरे समझ आता है
सुनना और समझना
एक जैसी चीज़ नहीं है।
लोग सुनते हैं
पर बीच में ही अपना जवाब तैयार कर रहे होते हैं।
तुम बोलते रहते हो,
वे सोचते रहते हैं
“मैं क्या कहूँगा।”
फिर तुम बोलना कम कर देते हो।
क्योंकि बार-बार समझाना
अब जरूरी नहीं लगता।
थका देता है।
एक दिन तुम नोटिस करते हो
कि तुम हँसते भी हो
तो खुद को पहले बता नहीं रहे।
रोते भी हो
तो किसी को नहीं बता रहे।
और सबसे अजीब बात
तुम्हें बुरा भी लगता है,
पर अब उसे शब्द देने का मन नहीं करता।
फिर एक स्टेज आता है
जहाँ तुम ठीक दिखने लगते हो।
सबके लिए।
पर खुद के लिए नहीं।
तुम बात करते हो,
पर अपनी असली बात नहीं।
तुम जवाब देते हो,
पर खुद को छोड़कर।
और धीरे-धीरे
तुम्हें एहसास होता है
तुम बोल तो रहे हो,
पर अब अपनी आवाज़ में नहीं।
फिर एक दिन
तुम चुप हो जाते हो।
और ये चुप्पी भारी नहीं लगती।
हल्की लगती है।
क्योंकि अब कुछ कहने की उम्मीद ही नहीं बचती।
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