Friday, June 19, 2026

शायद यही सबसे बड़ा खालीपन है

 शायद यही सबसे बड़ा खालीपन है


एक आदमी सुबह उठता है।


चाय पीता है।


काम पर निकलता है।


दिन भर फोन, जिम्मेदारी, फैसले, जवाब।


शाम को घर लौटता है।


थोड़ी देर टीवी।


फिर नींद।


और यही चक्र सालों चलता रहता है।


बाहर से सब सामान्य लगता है।


पर अंदर कुछ धीरे-धीरे बदलता रहता है।


एक समय था जब घर में उसकी आवाज़ का मतलब होता था।


“पापा आ गए।”


अब वही घर उसकी मौजूदगी को बस एक आदत की तरह लेता है।


कोई खास प्रतिक्रिया नहीं।


कोई खास जरूरत नहीं।


ऑफिस में भी वही कहानी होती है।


पहले उसकी राय मांगी जाती थी।


अब उसकी रिपोर्ट बस फाइल का हिस्सा बन जाती है।


पहले जहाँ उसकी मौजूदगी मायने रखती थी,


अब उसकी अनुपस्थिति भी किसी को रोकती नहीं।


वह इसे सीधे महसूस नहीं करता।


पर धीरे-धीरे समझने लगता है


कि लोग उसे इसलिए नहीं बुलाते क्योंकि वे उसे चाहते हैं,


बल्कि इसलिए क्योंकि काम है।


एक दिन वह बीमार पड़ता है।


दो-तीन दिन आराम करता है।


फोन थोड़े कम आते हैं।


काम थोड़ा रुकता है।


फिर सब वापस अपनी जगह चला जाता है।


जैसे कुछ बदला ही नहीं।


और यहीं से एक अजीब सा एहसास शुरू होता है।


कि अगर मैं न भी रहूँ,


तो भी सब चलता रहेगा।


यह विचार उसे डराता नहीं है।


बस भीतर कुछ हल्का सा तोड़ देता है।


वह सोचता है


मैं जो सालों से करता आया हूँ,


अगर वह सब किसी और ने भी कर लिया,


तो फिर मैं कहाँ हूँ?


न जवाब मिलता है।


न सवाल खत्म होता है।


वह अपने परिवार के लिए कमाता है।


बच्चों की फीस।


घर की जरूरतें।


रिश्तों की जिम्मेदारियाँ।


पर धीरे-धीरे एक दूरी बनती जाती है।


प्यार और जरूरत के बीच की दूरी।


और वह फर्क बहुत देर से समझ आता है।


बच्चा बड़ा हो जाता है।


अपनी दुनिया बना लेता है।


पत्नी अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाती है।


घर चलता रहता है।


पर उसमें उसकी भूमिका बदल जाती है।


मुख्य से सहायक।


सहायक से उपस्थित।


और फिर सिर्फ मौजूद।


वह बैठा रहता है।


सोचता नहीं है बहुत।


बस महसूस करता है


कि अब उसकी जरूरत पहले जैसी नहीं रही।


यहीं असली खालीपन शुरू होता है।


न दुख के साथ।


न आँसू के साथ।


बस एक शांत सी अनुपस्थिति के साथ।


सबसे अजीब बात यह है


वह असफल नहीं हुआ होता।


वह कमजोर नहीं होता।


वह बेकार भी नहीं होता।


वह बस धीरे-धीरे “जरूरत से बाहर” हो जाता है।


और जिसने पूरी जिंदगी अपनी कीमत “जरूरत” से तय की हो,


उसके लिए यह सबसे कठिन स्थिति होती है।


एक दिन वह चुपचाप बैठा होता है।


और उसे समझ आता है


मैंने लोगों के लिए बहुत कुछ किया,


पर खुद के लिए “मैं कौन हूँ” यह कभी नहीं पूछा।


न कोई बड़ा दर्द।


न कोई बड़ा हादसा।


बस एक धीमा सा एहसास


कि मेरा होना अब पहले जैसा अर्थ नहीं रखता।


शायद यही सबसे बड़ा खालीपन है।


जब आदमी खत्म नहीं होता…


बस धीरे-धीरे “जरूरी” नहीं रहता।

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