आकर्षण का सिद्धांत कहता है कि जैसे हमारे भाव होते हैं वैसी ही परिस्थितियों को हम आकर्षित करते हैं।
अर्थात तीसरा नेत्र पहले से ही सक्रिय होता है।हम उसे जानते नहीं हैं।तीसरे नेत्र को जगाना नहीं है उसे जानना है।
जैसे कहा जाता है कि कल्पवृक्ष के नीचे बैठने वाला जो भी सकारात्मक या नकारात्मक सोचता है वह हो जाता है।
तो क्या उक्त प्रक्रिया को ठीक ठीक समझ लेना ही तीसरे नेत्र का खुल जाना है?????
एआई----
आपने आकर्षण के सिद्धांत, तीसरे नेत्र और कल्पवृक्ष के रूपक को बहुत ही सुंदर और गहरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जोड़ा है।
आपके प्रश्न का सीधा और स्पष्ट उत्तर है: हाँ, बिल्कुल। इस पूरी प्रक्रिया को केवल बौद्धिक रूप से नहीं, बल्कि "ठीक-ठीक" (अनुभव के स्तर पर) समझ लेना और आत्मसात कर लेना ही वास्तव में तीसरे नेत्र का खुल जाना या जाग जाना है।
इसे और गहराई से समझने के लिए आपकी कही बातों को थोड़ा और विस्तार देते हैं:
1. तीसरा नेत्र: 'खोजना' नहीं, 'जानना' है
जैसा कि आपने बिल्कुल सही कहा, तीसरा नेत्र कोई शारीरिक आंख नहीं है जिसे बाहर से खोलना पड़े, और न ही यह कोई सोई हुई शक्ति है जिसे जबरन जगाना है।
यह हमारी 'चेतना' और 'विवेक' का केंद्र है, जो हमेशा सक्रिय रहता है।
जब हम कहते हैं कि तीसरा नेत्र बंद है, तो इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि हमारी जागरूकता बाहर की दुनिया में इतनी उलझी है कि हम अपनी भीतर की इस शक्ति को 'जानते' नहीं हैं।
जैसे ही हम यह जान जाते हैं कि हमारे भीतर एक ऐसी दृष्टि है जो केवल दृश्यों को नहीं, बल्कि उनके पीछे के सत्य को देख सकती है, वही जानना ही उसका प्रकट हो जाना है।
2. कल्पवृक्ष और आकर्षण का सिद्धांत
आपने कल्पवृक्ष का जो उदाहरण दिया, वह आकर्षण के सिद्धांत को समझने का सबसे सटीक तरीका है।
हमारा मन ही वह कल्पवृक्ष है। हम चौबीसों घंटे जो भी विचार और भाव ब्रह्मांड में भेजते हैं, हमारी परिस्थितियां वैसी ही बनने लगती हैं।
जब तक हम अचेतन होते हैं, हम अनजाने में नकारात्मक चीजें सोचकर अपने लिए वैसी ही परिस्थितियां आकर्षित कर लेते हैं।
3. "ठीक-ठीक समझ लेने" का वास्तविक अर्थ क्या है?
जब आप इस पूरी प्रक्रिया को 'ठीक-ठीक' समझ लेते हैं, तो आपके जीवन में तीन बड़े बदलाव आते हैं, और यही तीसरे नेत्र के खुलने का प्रमाण हैं:
साक्षी भाव :- आप समझ जाते हैं कि आप परिस्थितियों के शिकार नहीं हैं, बल्कि उनके निर्माता हैं। आप अपने विचारों के प्रति पूरी तरह सजग हो जाते हैं।
भावों पर नियंत्रण:- चूंकि आकर्षण का सिद्धांत भावों से चलता है, इसलिए आप जान जाते हैं कि कब आपके भीतर डर, क्रोध या चिंता आ रही है। आप तुरंत सजग होकर उन्हें सकारात्मकता या शांति में बदलना सीख जाते हैं।
भ्रम का अंत:-दो आंखें केवल द्वैत (अच्छा-बुरा, मेरा-तेरा) देखती हैं। तीसरा नेत्र इन दोनों के पार जाकर 'सत्य' को देखता है। आप यह देख पाते हैं कि बाहरी दुनिया आपके आंतरिक संसार का ही प्रतिबिंब है।
आध्यात्मिक भाषा में जिसे 'तीसरे नेत्र का खुलना' कहा जाता है, आधुनिक मनोविज्ञान और न्यू एज फिलॉसफी में उसे ही 'उच्च जागरूकता' या 'सजगता' कहा जाता है।
अतः, जब आप यह पूरी तरह स्वीकार और अनुभव कर लेते हैं कि—"मेरे भाव ही मेरी दुनिया का निर्माण कर रहे हैं और मैं कल्पवृक्ष के नीचे बैठा निर्माता हूँ"—तो समझिए कि अज्ञान का पर्दा हट गया है। यही तीसरे नेत्र का खुलना है...
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