ओशो के अनुसार एकांत अकेलापन नहीं है। अकेलापन अभाव है, जबकि एकांत पूर्णता है। जब मनुष्य कुछ समय के लिए संसार के शोर, विचारों की भीड़ और इच्छाओं के कोलाहल से दूर होकर स्वयं में बैठता है, तब भीतर की चेतना जागने लगती है।
एकांत में बैठना किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं, बल्कि स्वयं को देखने की कला है। धीरे-धीरे मन शांत होता है, विचार विराम लेने लगते हैं और भीतर का मौन प्रकट होता है। उसी मौन में जीवन के गहरे उत्तर जन्म लेते हैं।
जब तुम स्वयं के साथ सहज हो जाते हो, तब ब्रह्मांड तुम्हारा मार्गदर्शक बन जाता है। जिन प्रश्नों के उत्तर बाहर खोज रहे थे, वे भीतर से प्रकट होने लगते हैं। तब रास्ते बनाए नहीं जाते, वे स्वयं खुलते चले जाते हैं।
"मौन में बैठो, प्रतीक्षा करो।
जो तुम्हारे लिए है, वह स्वयं तुम्हें खोज लेगा...
ओशो कहते हैं कि संसार वैसा नहीं है जैसा वह है, बल्कि वैसा दिखाई देता है जैसी हमारी चेतना है। यदि मन क्रोध, भय, ईर्ष्या और दुख से भरा है, तो पूरी दुनिया वैसी ही प्रतीत होगी। लेकिन जब भीतर प्रेम, शांति और जागरूकता का दीपक जलता है, तो वही दुनिया सुंदर और अर्थपूर्ण लगने लगती है।
दुनिया को बदलने की कोशिश में मनुष्य अपना पूरा जीवन लगा देता है, पर स्वयं को बदलने का साहस नहीं करता। ओशो कहते हैं कि परिवर्तन की शुरुआत हमेशा भीतर से होती है। जब दृष्टि बदलती है, तब दृश्य भी बदल जाता है।
यदि तुम शांति चाहते हो, तो पहले अपने भीतर शांति पैदा करो। यदि प्रेम चाहते हो, तो पहले स्वयं प्रेममय बनो। संसार तुम्हारे मन का दर्पण है; जो भीतर है, वही बाहर प्रतिबिंबित होता है।
"खुद को बदलो, क्योंकि तुम्हारे पास बदलने के लिए केवल तुम स्वयं हो। जब तुम बदलते हो, तो तुम्हारा संसार भी बदल जाता है।"
यही ध्यान का सार है—दूसरों को नहीं, स्वयं को जानना और रूपांतरित करना। जब भीतर प्रकाश होता है, तब जीवन का हर क्षण उत्सव बन जाता है।
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