गांठें, ज़हर और श्मशान का अभिनय
मनुष्य बड़ा अजीब प्राणी है।
जब तक कोई जीवित रहता है, तब तक उसके पास जाने का समय नहीं होता। उसके लिए एक फोन करने का समय नहीं होता। उसके दुःख पूछने का समय नहीं होता। उसके दरवाज़े तक जाने का साहस नहीं होता।
लेकिन जैसे ही वह मर जाता है, अचानक प्रेम उमड़ पड़ता है।
श्मशान भर जाता है।
लोग रोते हैं, छाती पीटते हैं, कहते हैं — "बहुत अच्छा आदमी था", "ऐसा इंसान फिर नहीं मिलेगा", "उसकी कमी कभी पूरी नहीं होगी।"
मैं पूछता हूँ, अगर इतना अच्छा था तो जीते-जी उसके पास क्यों नहीं गए?
अगर इतना प्रिय था तो वर्षों तक उससे बात क्यों नहीं की?
अगर इतना सम्मान था तो अपने अहंकार की गांठ खोलकर उसके घर का दरवाज़ा क्यों नहीं खटखटाया?
सच्चाई यह है कि अधिकांश लोगों का शोक भी अभिनय है।
जीवन भर नफरत पालते हैं और मृत्यु के दिन फूल लेकर पहुँच जाते हैं।
यह कैसी विडम्बना है?
तुम्हारे भीतर जो गांठें हैं, वे किसी और को नहीं बाँध रहीं। वे तुम्हें बाँध रही हैं।
तुम्हारे भीतर जो ज़हर भरा है, वह किसी और को नहीं जला रहा। वह तुम्हारे ही रक्त में घूम रहा है।
जिस व्यक्ति से तुम नफरत करते हो, संभव है उसे तुम्हारी नफरत का पता भी न हो। वह अपनी जिंदगी जी रहा है।
लेकिन तुम?
तुम रातों को जाग रहे हो।
तुम्हारा रक्तचाप बढ़ रहा है।
तुम्हारा मन अशांत हो रहा है।
तुम्हारी मुस्कान मर रही है।
तुम्हारी करुणा सूख रही है।
और तुम सोचते हो कि तुम किसी दूसरे को सज़ा दे रहे हो!
नफरत सबसे मूर्खतापूर्ण आत्महत्या है।
यह ऐसा ज़हर है जिसे पीने वाला स्वयं होता है और उम्मीद करता है कि दूसरा मर जाएगा।
तुमने अपने भीतर कितनी गांठें बाँध रखी हैं?
किसी से मतभेद की गांठ।
किसी से अपमान की गांठ।
किसी से ईर्ष्या की गांठ।
किसी से प्रतिस्पर्धा की गांठ।
किसी से धर्म की गांठ।
किसी से जाति की गांठ।
किसी से अहंकार की गांठ।
और फिर कहते हो कि जीवन में आनंद नहीं है।
आनंद कहाँ से आएगा?
जिस हृदय में गांठें भरी हों, वहाँ संगीत कैसे बजेगा?
जिस मन में ज़हर भरा हो, वहाँ प्रेम कैसे खिलेगा?
जिस आत्मा पर नफरत की धूल जमी हो, वहाँ ध्यान कैसे उतरेगा?
याद रखो—
मृत्यु के समय तुम्हारे साथ न तुम्हारा धन जाएगा, न तुम्हारी प्रतिष्ठा, न तुम्हारी जीतें।
लेकिन जीवन भर जो ज़हर तुमने अपने भीतर पाला, उसका दंश तुमने हर दिन झेला होगा।
और सबसे बड़ा सत्य यह है कि जिस व्यक्ति से तुम घृणा करते हो, धीरे-धीरे तुम उसी जैसे बनने लगते हो।
घृणा एक अदृश्य पुल है।
तुम जिसके विरुद्ध लड़ते रहते हो, अंततः उसकी छाया बन जाते हो।
इसलिए मैं कहता हूँ—
अगर किसी से प्रेम नहीं कर सकते, तो कम से कम उसे क्षमा कर दो।
अगर क्षमा नहीं कर सकते, तो कम से कम उसे अपने मन से मुक्त कर दो।
क्योंकि जिसे तुमने अपने मन में कैद कर रखा है, वास्तव में कैदी वह नहीं, तुम स्वयं हो।
श्मशान पहुँचकर रोने से बेहतर है कि आज किसी को फोन कर लो
फूल लेकर जाने से बेहतर है कि आज उसके द्वार पर दस्तक दे दो।
मृत्यु के बाद श्रद्धांजलि देने से बेहतर है कि जीवन रहते सम्मान दे दो।
क्योंकि मरने वालों को तुम्हारे आँसू नहीं चाहिए।
जीवित लोगों को तुम्हारा प्रेम चाहिए।
और जो प्रेम जीते-जी नहीं दिया गया, वह श्मशान में पहुँचकर केवल एक सामाजिक अभिनय रह जाता है।
गांठें खोलो।
ज़हर बहा दो।
अहंकार उतार दो।
क्योंकि जीवन बहुत छोटा है, और मृत्यु आने से पहले प्रेम करने का अवसर बार-बार नहीं मिलता।
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