पसंदीदा इंसान के बदन की खुशबू
कुछ खुशबुएँ फूलों में नहीं होतीं, न इत्र की शीशियों में, न किसी मौसम के दामन में।
कुछ खुशबुएँ किसी एक इंसान में बसती हैं।
और फिर ऐसा होता है कि वो इंसान चला जाता है, मगर उसकी खुशबू नहीं जाती।
वो ठहर जाती है हमारी साँसों के किसी कोने में, हमारी त्वचा की किसी स्मृति में, हमारे दिल की किसी ऐसी जगह पर, जहाँ वक्त का कोई अधिकार नहीं होता।
कभी-कभी उसके जाने के घंटों बाद भी अचानक एक हल्की सी फुरफुरी उठती है।
और मन कहता है— अभी-अभी तो वो यहीं था।
अभी-अभी तो उसकी बाँहों का घेरा मेरे चारों ओर था।
अभी-अभी तो उसकी मौजूदगी ने मेरे अस्तित्व को छुआ था।
फिर मैं अपनी ही कलाई को देखता हूँ, अपने ही कंधे को छूता हूँ, अपने ही सीने पर हाथ रखता हूँ, और लगता है जैसे वहाँ कोई स्मृति अब भी साँस ले रही हो।
जैसे कोई महक त्वचा से नहीं, रूह से उठ रही हो।
अजीब बात है...
पानी बदन को धो सकता है, लेकिन एहसासों को नहीं।
कपड़े धुल जाते हैं, मगर उनसे जुड़ी यादें नहीं।
वक्त बीत जाता है, मगर कुछ स्पर्श समय की पकड़ से बाहर हो जाते हैं।
और फिर किसी शाम, जब हवा थोड़ी धीमी चल रही हो, जब तन्हाई थोड़ी गहरी हो, जब दिल को किसी अपने की कमी कुछ ज़्यादा महसूस हो रही हो,
तब अचानक वही जानी-पहचानी खुशबू यादों के किसी दरवाज़े से भीतर चली आती है।
और मैं वहीं ठहर जाता हूँ।
आँखें बंद कर लेता हूँ।
क्योंकि उस एक क्षण में दूरी हार जाती है।
लगता है जैसे वो फिर से मेरे करीब है।
जैसे उसकी मौजूदगी हवा में घुलकर मुझे चारों तरफ़ से घेर रही है।
जैसे कोई अदृश्य स्पर्श मेरे कंधों पर उतर आया हो।
जैसे कोई परिचित गर्माहट फिर से दिल के आसपास अपना घर बना रही हो।
और तब पूरा शरीर नहीं, पूरा अस्तित्व याद करने लगता है।
याद करने लगता है वो क्षण, जब दुनिया बहुत दूर थी और एक इंसान बहुत पास।
जब शब्द कम थे, मगर एहसास बहुत थे।
जब ख़ामोशी बोलती थी, और धड़कनें सुनती थीं।
जब किसी की मौजूदगी ही सुकून का दूसरा नाम थी।
शायद इसी लिए पसंदीदा इंसान की खुशबू सिर्फ खुशबू नहीं होती।
वह एक दरवाज़ा होती है।
एक ऐसा दरवाज़ा जो हमें उन लम्हों तक ले जाता है जहाँ प्रेम ने पहली बार हमारे नाम की लौ जलाई थी।
जहाँ किसी की नज़दीकी ने हमारे भीतर की सारी वीरानी को कुछ देर के लिए भुला दिया था।
और तब समझ आता है—
कि प्रेम कभी-कभी यादों से नहीं लौटता, खुशबुओं से लौटता है।
एक हल्की सी महक बनकर।
एक मीठी सी बेचैनी बनकर।
एक अनकही सी चाह बनकर।
और फिर देर तक दिल उसी एहसास में डूबा रहता है...
जैसे कोई बहुत अपना इंसान दूर होकर भी दूर न हुआ हो,
जैसे हवा उसके नाम का पैग़ाम लेकर आई हो,
और जैसे प्रेम, एक बार फिर, बिना दिखाई दिए हमें अपनी बाँहों में भर रहा हो।
क्योंकि कुछ लोग साथ नहीं रहते, लेकिन उनकी खुशबू उम्र भर हमारे भीतर रहती है... बिल्कुल प्रेम की तरह।
No comments:
Post a Comment