प्रेम का वृक्ष
प्रेम कोई फूल नहीं
जो एक मौसम में खिले
और दूसरे मौसम में झर जाए,
प्रेम तो उस वृक्ष जैसा है
जो चुपचाप धरती के भीतर
अपनी जड़ें फैलाता रहता है,
जबकि दुनिया उसकी शाखाओं को देखकर
उसकी उम्र का अनुमान लगाती है।
कभी-कभी
एक स्त्री उस वृक्ष की तरह होती है।
वह अपने भीतर
बारिशें जमा करती है,
धूप सहती है,
आंधियों से लड़ती है,
और फिर भी
किसी थके हुए पथिक को
छाँव देना नहीं भूलती।
उसका प्रेम
नदी की तरह होता है।
नदी यह नहीं पूछती
कि सामने वाला पहाड़ है,
मैदान है,
या रेगिस्तान।
वह बस बहती है,
अपने पूरे मन से।
उसे लगता है
जिसे उसने अपना जल दिया,
वह उसकी प्यास भी समझेगा।
पर जीवन हमेशा
नदियों के नियमों से नहीं चलता।
कई बार
जिसे वह अपना सागर समझती है,
वह केवल एक किनारा होता है।
और तब
नदी बहती तो रहती है,
लेकिन उसके जल में
एक अनकहा खारापन उतर आता है।
रात जब बहुत गहरी होती है,
और घर की सारी आवाजें
नींद में खो जाती हैं,
तब कुछ दिल
अब भी जाग रहे होते हैं।
एक स्त्री
खिड़की के पास बैठी होती है,
चाँद को नहीं देख रही होती,
बल्कि उन दिनों को देख रही होती है
जो लौटकर नहीं आते।
वह किसी का नाम नहीं लेती,
किसी से शिकायत नहीं करती,
बस कभी-कभी
पुरानी तस्वीरों की धूल झाड़ती है
और मुस्कुराने की कोशिश करती है।
मगर स्मृतियाँ
बड़ी जिद्दी होती हैं।
वे दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आतीं,
वे तो हवा बनकर
अचानक कमरे में भर जाती हैं।
एक गीत सुनते ही,
एक गंध महसूस होते ही,
एक पुरानी सड़क देखते ही।
फिर मन
उसी जगह लौट जाता है
जहाँ से वह वर्षों पहले चला था।
पुरुष भी प्रेम करते हैं।
लेकिन उनका प्रेम
अक्सर पहाड़ जैसा होता है।
ऊपर से कठोर,
भीतर से चुप।
वे अपने सपनों,
संघर्षों,
और जिम्मेदारियों के बीच
प्रेम को साथ लेकर चलते हैं।
उन्हें लगता है
प्रेम है,
तो वह रहेगा।
जैसे सूरज हर सुबह उगेगा,
जैसे धरती घूमती रहेगी।
वे हर भावना को
शब्दों में नहीं कहते।
और कई बार
यहीं से दूरी जन्म लेती है।
एक हृदय
सुनना चाहता है
"मैं तुम्हें याद करता हूँ।"
दूसरा हृदय सोचता है
"यह तो उसे पता ही होगा।"
दोनों प्रेम में होते हैं,
फिर भी
दोनों अकेले पड़ जाते हैं।
प्रेम की सबसे बड़ी विडंबना यही है
लोग एक-दूसरे से नहीं,
अपनी अपेक्षाओं से हारते हैं।
कोई चाहता है
उसे बिना कहे समझ लिया जाए।
कोई चाहता है
उसे वैसे ही स्वीकार कर लिया जाए
जैसा वह है।
और इन दोनों इच्छाओं के बीच
एक लंबी खामोशी जन्म लेती है।
वर्ष बीतते हैं।
बालों में चाँदी उतर आती है।
चेहरे पर समय
अपनी लकीरें लिख देता है।
लेकिन प्रेम...
यदि वह सच्चा हो,
तो वह उम्र से नहीं थकता।
वह किसी पुराने बरगद की तरह
और गहरा हो जाता है।
उसकी जड़ें
और दूर तक फैल जाती हैं।
तब मन समझता है
प्रेम किसी को पा लेना नहीं है।
प्रेम किसी पर अधिकार नहीं है।
प्रेम किसी को खोकर
टूट जाना भी नहीं है।
प्रेम तो वह शक्ति है
जो खोने के बाद भी
मनुष्य को कोमल बनाए रखती है।
जो दर्द के बाद भी
विश्वास करना सिखाती है।
जो विदा के बाद भी
दुआ देना नहीं भूलती।
और शायद
प्रेम का अंतिम अर्थ यही है
किसी को इतना चाहना
कि उसके जाने के बाद भी
अपने भीतर की रोशनी बची रहे।
क्योंकि जो स्वयं को खो देता है,
वह प्रेम को भी खो देता है।
और जो स्वयं को बचाए रखता है,
वह हर बिछड़न के बाद भी
प्रेम का वृक्ष उगा सकता है।
एक दिन
जब जीवन की सांझ उतरेगी,
जब स्मृतियाँ
पक्षियों की तरह लौटकर आएँगी,
जब समय
धीरे-धीरे अपनी चाल रोक देगा,
तब मन शायद मुस्कुराकर कहेगा
मैंने प्रेम किया था।
पूरे मन से किया था।
इसलिए नहीं कि कोई मेरे साथ रहे,
बल्कि इसलिए
कि प्रेम ने मुझे
और अधिक मनुष्य बना दिया।
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