नाम का हक़
वो अक्सर कहा करती थी,
“रिश्तों को नामों की क्या ज़रूरत है?
अगर दो दिल एक-दूसरे को पहचानते हों,
तो दुनिया की पहचान से क्या फ़र्क पड़ता है...”
मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा देता था।
सालों तक हम एक-दूसरे की ज़िंदगी में ऐसे शामिल रहे,
जैसे साँस में खुशबू शामिल होती है
दिखती नहीं, मगर होती हर पल है।
लोग पूछते, “क्या रिश्ता है तुम्हारा?”
और हम हँसकर बात बदल देते।
फिर एक शाम उसकी माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
अस्पताल के उस लंबे, सफ़ेद गलियारे में
वह स्टूल पर बैठी रो रही थी।
सिर घुटनों में छिपा था
और कंधे सिसकियों के बोझ से काँप रहे थे।
मैं दौड़कर उसके पास पहुँचा।
दिल चाहता था उसके सिर पर हाथ रख दूँ,
उसे सीने से लगा लूँ और कहूँ, “मैं हूँ...”
मगर तभी डॉक्टर ने एक काग़ज़ आगे बढ़ाया और कहा,
“परिवार का कोई सदस्य दस्तख़त कर दीजिए।”
मैंने हाथ बढ़ाया...
और उसी पल किसी ने पूछ लिया, “आप लगते क्या हैं इनके?”
एक छोटा-सा सवाल था।
लेकिन उसने बरसों से खड़े हमारे पूरे रिश्ते को
एक पल में अनाथ कर दिया।
मेरा हाथ हवा में ही ठहर गया।
मैं उसके लिए सब कुछ था...
मगर उस काग़ज़ पर मेरा कोई नाम नहीं था।
मैं कुछ दूर खड़ा रहा।
वो कुछ दूर बैठी रही।
और हमारे बीच बस कुछ क़दमों का नहीं,
एक पूरे समाज का फ़ासला खड़ा था।
फिर उसने सिर उठाकर मेरी तरफ देखा।
उस नज़र में शिकायत नहीं थी...
बस एक थका हुआ, टूटा हुआ सवाल था
अगर तुम मेरे अपने हो... तो आज मेरे पास क्यों नहीं हो?
उस रात अस्पताल की ठंडी रोशनी में,
उसकी आँखों से सिर्फ आँसू नहीं बहे...
उसकी एक पुरानी सोच भी बह गई।
उसे समझ आया कि कुछ रिश्ते
सिर्फ दिल में नहीं निभाए जा सकते।
कुछ मोहब्बतों को दुनिया के सामने भी जीना पड़ता है।
क्योंकि प्रेम सिर्फ किसी को महसूस करने का नाम नहीं है...
प्रेम वह हक़ भी है,
जिसके सहारे किसी का काँपता हुआ हाथ पकड़कर कहा जा सके
"डरो मत... मैं यहीं हूँ।"
उस दिन उसने जाना कि रिश्तों के नाम उन्हें बाँधते नहीं...
उन्हें एक जगह देते हैं।
एक ऐसा हक़, जहाँ मोहब्बत सिर्फ ख़्वाब नहीं रहती, ज़िंदगी बन जाती है।
और शायद कुछ प्रेम कहानियाँ अधूरी इसलिए रह जाती हैं...
क्योंकि उनमें प्रेम तो बहुत होता है,
मगर पुकारने के लिए कोई नाम नहीं होता।
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