Tuesday, June 2, 2026

प्रेम अर्थ

 ❤️ आक्रामक प्रेम में डर है 

कि कहीं कामवासना छिपी हो। 

वास्तविक प्रेम तो प्रार्थनापूर्ण होता है, 

वासनापूर्ण नहीं होता। 

💕 

वास्तविक प्रेम को दूसरे को 

गले लगाना जरूरी भी नहीं है। 


💞 वास्तविक प्रेम तो एक आशीर्वाद है। 

तुम किसी के पास से गुजरे, 

आशीर्वाद से भरे हुए गुजरे, काफी है। 

💞 

आत्मा आत्मा को गले लग गयी, 

शरीर को शरीर से लगाने से क्या प्रयोजन है!  

कभी-कभी आत्मा के गले लगने के 

साथ-साथ शरीर का गले लगना भी घट जाए, 

तो शुभ है। लेकिन वह घटे, घटाया न जाए। 

💞 

कभी ऐसा होगा कि तुम बड़े 

आशीर्वाद से भरे हुए किसी के 

पास से निकलते थे और 

उसके हृदय में भी तुम्हारे आशीर्वाद की 

तरंगें पहुंचीं और दोनों एक-साथ 

किसी अनजानी शक्ति के वशीभूत होकर 

एक-दूसरे के गले लग गये। 

💞 

तो तुम गले लगे ऐसा नहीं, 

दूसरा गले लगा ऐसा नहीं, 

प्रेम ने दोनों को गले लगा दिया। 

यह बड़ी और घटना है। 

💞 

जब तुम लगते हो गले, तो वासना है। 

तुम्हारी वासना के कारण दूसरा हटेगा। 

कृपा करके ऐसा आक्रमण किसी पर मत करना। 

तुम दूसरे को भयभीत कर दोगे।

💕 

वासना की आंख से देखा जाना किसी को भी पसंद नहीं। 

प्रेम की आंख से देखा जाना सभी को पसंद है। 

तो दोनों आंखों की परिभाषा समझ लो। 

💕 

वासना का अर्थ है, 

वासना की आंख का अर्थ है कि 

तुम्हारी देह कुछ ऐसी है कि 

मैं इसका उपयोग करना चाहूंगा। 

💞 

प्रेम की आंख का अर्थ है, 

तुम्हारा कोई उपयोग करने का सवाल नहीं, 

तुम हो, इससे मैं आनंदित हूं। 

तुम्हारा होना, अहोभाग्य है!

बात खतम हो गयी।  

💞 

प्रेम को कुछ लेना-देना नहीं है। 

वासना कहती है, वासना की तृप्ति में और 

तृप्ति के बाद सुख होगा; 

प्रेम कहता है, प्रेम के होने में सुख हो गया। 

💞 

इसलिए प्रेमी की कोई मांग नहीं है। 

तब तो तुम अजनबी के पास से 

भी प्रेम से भरे निकल सकते हो। 

कुछ करने का सवाल ही नहीं है। 

हड्डियों को हड्डियों से लगा लेने से कैसे प्रेम हो जाएगा! प्रेम तो दो आत्माओं का निकट होना है। 

और कभी-कभी ऐसा हो सकता है 

कि जिसके पास तुम वर्षों से रहे हो, 

बिलकुल पास रहे हो, पास न होओ; 

💞 

और कभी ऐसा भी हो सकता है 

कि राह चलते किसी अजनबी के 

साथ तत्क्षण संग हो जाए, मेल हो जाए, 

कोई भीतर का संगीत बज उठे, 

कोई वीणा कंपित हो उठे।

बस काफी है। 

उस क्षण परमात्मा को धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाना। पीछे लौटकर भी देखने की प्रेम को जरूरत नहीं है। 

पीछे लौट-लौटकर वासना देखती है। 

और वासना चाहती है कि दूसरा मेरे अनुकूल चले।


प्रेम: एक संबंध नहीं, चेतना की अवस्था

हमने प्रेम को अक्सर किसी व्यक्ति से जोड़कर देखा है।

किसी का साथ मिल जाए तो प्रेम है, कोई दूर चला जाए तो प्रेम समाप्त हो गया।

लेकिन क्या प्रेम सचमुच इतना सीमित है?

यदि प्रेम केवल किसी एक व्यक्ति पर निर्भर होता, तो उसके जाने के साथ प्रेम भी समाप्त हो जाता।

परंतु सत्य यह है कि प्रेम किसी व्यक्ति का गुण नहीं, चेतना की एक अवस्था है।

जब मन लगातार मांगना छोड़ देता है,

जब "मुझे क्या मिलेगा?" का प्रश्न धीरे-धीरे विलीन होने लगता है,

जब स्वार्थ, अधिकार और अपेक्षाओं की पकड़ ढीली पड़ जाती है,

तब भीतर एक नई संवेदना जन्म लेती है।

वह प्रेम किसी विशेष व्यक्ति के लिए नहीं होता,

वह जीवन के प्रति खुलापन बन जाता है।

तब वृक्ष भी प्रिय लगते हैं,

पक्षियों का स्वर भी मधुर लगता है,

अजनबी चेहरों में भी अपनापन दिखाई देने लगता है।

ऐसा प्रेम बंधन नहीं बनाता, स्वतंत्र करता है।

वह किसी को अपनी इच्छा के अनुसार बदलना नहीं चाहता,

बल्कि उसे उसके सत्य में स्वीकार कर लेता है।

शायद इसी कारण महान संतों और मनीषियों ने प्रेम को भावना से अधिक एक आध्यात्मिक अवस्था कहा है।

क्योंकि भावना आती-जाती रहती है,

पर चेतना की अवस्था जीवन का स्वरूप बदल देती है।

जब प्रेम भीतर जागता है,

तो संसार वैसा ही रहता है,

पर उसे देखने वाली दृष्टि बदल जाती है।

प्रेम किसी को पाने का नाम नहीं,

स्वयं को इतना विस्तृत कर लेने का नाम है कि समस्त अस्तित्व उसमें समा जाए।


 

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