Friday, June 19, 2026

तीन जन्मों का प्रेम

 तीन जन्मों का प्रेम~~~


कहते हैं,

कुछ प्रेम कहानियाँ एक जीवन में पूरी नहीं होतीं।

उन्हें चाहिए होते हैं कई जन्म, कई बिछोह, कई चिताएँ, और कई पुनर्जन्म।

शायद हमारी कथा भी ऐसी ही थी।

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1️⃣पहला जन्म~~


किसी प्राचीन नगर में,

जहाँ संध्या के समय मंदिरों की घंटियाँ आकाश में उड़ते पक्षियों के साथ घर लौटती थीं।

मैंने तुम्हें पहली बार देखा था।

और उस पहली दृष्टि में ही

एक अजीब-सी पहचान थी।

जैसे तुमसे मिलना नया नहीं,

बहुत पुराना हो।

जैसे आत्मा अचानक अपना भूला हुआ नाम याद कर ले।

हम प्रेम में पड़े।

पर समय प्रेमियों का पक्षधर कहाँ होता है?

युद्ध आया।

वियोग आया।

और एक दिन

मेरी अर्थी उठी।

तुम रोती रहीं।

मैं जाता रहा।

मुखाग्नि दी गई।

चिता जलती रही।

पर अग्नि मेरी देह को जला सकी,

तुम्हारे प्रति मेरी प्रतीक्षा को नहीं।

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2️⃣दूसरा जन्म~~~


यमलोक में

जब मेरे कर्मों का लेखा हुआ,

यमराज ने पूछा—

"क्या चाहते हो?"

मैंने कहा—

"उसे।"

उन्होंने कहा—

"मोक्ष?"

मैंने कहा—

"उसके बिना नहीं।"

उन्होंने मेरे भाग्य में एक और जन्म लिख दिया।

और मैं लौट आया।

फिर पृथ्वी पर।

फिर मनुष्य बनकर।

फिर उसी बेचैनी के साथ।

इस जन्म में भी

जब पहली बार तुम्हें देखा,

हृदय ने कहा—

"अरे... तुम तो वही हो।"

तुम अजनबी थीं।

पर तुम्हारी आँखों का दुःख पहचाना हुआ था।

तुम्हारी चुप्पी जानी-पहचानी थी।

तुम्हारे भीतर भी

कोई अधूरापन था,

जो मेरे भीतर के रिक्त स्थान से मिलता-जुलता था।

हम फिर मिले।

फिर प्रेम हुआ।

फिर परिस्थितियाँ जीतीं।

फिर हम हार गए।

इस बार तुम गईं।

और मैं रह गया।

भागीरथी के तट पर बैठा,

मणिकर्णिका की अग्नियों को देखते हुए।


सोचता रहा—

कितनी बार एक ही आत्मा को खोया जा सकता है?

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3️⃣तीसरा जन्म~~~~


फिर मृत्यु आई।

फिर अस्थियाँ भागीरथी में प्रवाहित हुईं।

फिर आत्मा यमलोक पहुँची।

इस बार

यमराज ने कुछ नहीं पूछा।

उन्होंने बस मेरी ओर देखा।

और मुस्कुराकर बोले—

"अभी भी वही?"

मैंने कहा—

"अभी भी वही।"

उन्होंने कहा—

"तुम्हारा दंड भी वही है, और तुम्हारा वरदान भी वही।"

फिर एक तीसरा जन्म मिला।

शायद वही जन्म

जो अभी भविष्य में कहीं हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।

जहाँ हम फिर मिलेंगे।

किसी स्टेशन पर।

किसी पुस्तकालय में।

किसी घाट पर।

या किसी भीड़ भरे शहर में।

और पहली ही नज़र में

फिर वही अनुभूति होगी—

कि यह मिलना नया नहीं है।

यह तो सदियों से चल रही एक अधूरी प्रार्थना का अगला श्लोक है।

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और शायद

उस जन्म में

न युद्ध होगा,

न दूरी,

न कोई ऐसी त्रासदी

जो दो आत्माओं को अलग कर सके।

शायद उस जन्म में

हम अपने हिस्से का अधूरापन एक-दूसरे में पा लेंगे।

और जब उस जीवन के अंत में

हम दोनों की चिताओं का धुआँ एक ही आकाश में उठेगा,

तब यमलोक के द्वार पर

कोई प्रश्न नहीं होगा।

कोई पुनर्जन्म नहीं होगा।

कोई प्रतीक्षा नहीं होगी।

तब हमारी आत्माएँ

दो नदियों की तरह एक ही समुद्र में मिल जाएँगी।

तब मणिकर्णिका वियोग का नहीं, मुक्ति का घाट होगी।

तब भागीरथी अस्थियाँ नहीं, प्रेम का अंतिम तर्पण बहाएगी।


और तब,

बैकुंठ के किसी शांत प्रकाश में,

जहाँ समय समाप्त हो जाता है,

हम दोनों साथ बैठेंगे।

बिना भय।

बिना बिछोह।

बिना अगले जन्म की चिंता।

क्योंकि तब

प्रेम कहानी नहीं रहेगा,

वह मोक्ष बन जाएगा।

और दो अधूरी आत्माएँ,


अंततः,

पूर्ण हो जाएँगी।॥ 

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