श्रृंता काँपते हुए हाथों से मोबाइल उठाती है।
उंगलियाँ स्क्रीन पर ठहरी हुई थीं। शब्द उसके भीतर तूफान की तरह उमड़ रहे थे, लेकिन बाहर आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। बहुत देर तक वह खाली चैट बॉक्स को देखती रही। फिर जैसे सारी ताकत समेटकर उसने केवल एक शब्द टाइप किया..
"हम्म्म..."
बस इतना ही।
लेकिन वह जानती थी कि यह छोटा-सा शब्द कोई साधारण उत्तर नहीं था। यह वर्षों से दबे हुए दर्द, अनगिनत अनकहे सवालों, और धीरे-धीरे मरती हुई उम्मीदों का दरवाज़ा खोल सकता था। यह एक ऐसा कदम था जिसके बाद शायद उसकी ज़िंदगी पहले जैसी कभी नहीं रहने वाली थी।
मोबाइल हाथ में लिए वह खुद से लड़ रही थी।
"क्या मैं सही कर रही हूँ?"
सवाल बार-बार उसके मन में उठ रहा था।
बचपन से उसने सुना था कि पति ही स्त्री का संसार होता है। वही उसका साथी, उसका मित्र, उसका संबल और उसका अपना होता है। विवाह के बाद उसने भी यही सपना देखा था कि कोई होगा जो उसकी बातें सुनेगा, उसके साथ हँसेगा, उसके आँसू समझेगा, उसके मन की खामोशी को भी पढ़ लेगा।
लेकिन उसके हिस्से में जो आया, वह साथ नहीं, केवल एक रिश्ता था एक ऐसा रिश्ता जो बाहर से पूरा दिखता था, मगर भीतर से खोखला था।
उसे अक्सर लगता था जैसे वह कोई इंसान नहीं, एक गुड़िया हो।
जिस तरह किसी खिलौने में चाभी भर दी जाती है और वह कुछ देर चलकर फिर एक कोने में रख दिया जाता है, ठीक वैसा ही उसका जीवन बन गया था।
जब जरूरत हुई, उससे बातें कर ली गईं।
जब मन हुआ, उससे उम्मीदें कर ली गईं।
जब इच्छा हुई, उसका इस्तेमाल कर लिया गया।
और फिर उसे उसकी तन्हाई के हवाले छोड़ दिया गया।
किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि उसके मन में क्या चल रहा है।
उसकी इच्छाएँ क्या हैं।
उसके सपने क्या हैं।
उसे किस बात से खुशी मिलती है।
उसे किस बात से चोट पहुँचती है।
वह भी तो बातें करना चाहती थी।
वह भी चाहती थी कि कोई उसके साथ बैठे और बिना किसी वजह के घंटों बातें करे।
वह भी चाहती थी कि जीवन केवल जिम्मेदारियों और औपचारिकताओं का नाम न हो, बल्कि उसमें दोस्ती, अपनापन और साथ होने की गर्माहट भी हो।
अगर यह सब कभी-कभार होता, तो शायद वह समझौता कर लेती।
लेकिन यह एक दिन, एक महीने या एक साल की बात नहीं थी।
यह तो वर्षों का जमा हुआ खालीपन था।
हर दिन उसका मन थोड़ा-थोड़ा टूटता था।
हर दिन उसकी उम्मीदें थोड़ी और मर जाती थीं।
मानसिक दबाव उसने सह लिया।
अनदेखी भी सह ली।
अपनी भावनाओं की हत्या भी सह ली।
लेकिन फिर एक दिन बात केवल मन तक सीमित नहीं रही।
जब शब्दों की चोटें शरीर तक पहुँचने लगीं, तब उसके भीतर कुछ हमेशा के लिए बदल गया।
क्योंकि जब मन और तन दोनों घायल होने लगें, तब सबसे गहरी चोट आत्मा पर लगती है।
और आत्मा के घाव दिखाई नहीं देते।
वे बस इंसान को भीतर से खोखला कर देते हैं।
उसे कभी समझा ही नहीं गया।
वह कभी केवल शरीर का प्रेम नहीं चाहती थी।
उसे तो मन का स्पर्श चाहिए था।
वह जब सजती थी, तो दुनिया को दिखाने के लिए नहीं।
वह तो सिर्फ उसकी एक मुस्कान देखने के लिए सजती थी।
उसकी एक तारीफ सुनने के लिए।
उसकी आँखों में अपने लिए थोड़ा-सा प्रेम देखने के लिए।
लेकिन उसकी मेहनत, उसका सिंगार, उसका इंतजार सब धीरे-धीरे अर्थहीन होते गए।
समय के साथ उसने शिकायत करना भी छोड़ दिया।
क्योंकि जब हर शिकायत अनसुनी रह जाए, तो इंसान बोलना बंद कर देता है।
और जब बोलना बंद कर दे, तब समझ लेना चाहिए कि वह हार चुका है।
अब उसके भीतर कोई इच्छा शेष नहीं थी।
न कोई सपना।
न कोई उम्मीद।
न कोई शिकायत।
सब कुछ जैसे धीरे-धीरे मर चुका था।
वह साँस तो ले रही थी, लेकिन जी नहीं रही थी।
चारों ओर एक निर्जीव दुनिया थी, और उसी दुनिया में वह भी एक निर्जीव जीवन जी रही थी।
आज मोबाइल की स्क्रीन पर लिखा वह छोटा-सा "हम्म्म..." दरअसल एक शब्द नहीं था।
वह वर्षों की चुप्पी का पहला स्वर था।
एक टूटी हुई आत्मा की धीमी पुकार था।
एक ऐसे मोड़ की शुरुआत था जहाँ सही और गलत की रेखाएँ धुँधली हो चुकी थीं।
जहाँ केवल एक सवाल बचा था..
"क्या किसी इंसान को प्रेम, सम्मान और अपनापन पाने का अधिकार नहीं है?"
और इस सवाल का उत्तर खोजते-खोजते श्रृंता की आँखों से एक आँसू गिर पड़ा।
स्क्रीन पर चमकते उस छोटे-से शब्द के ऊपर।
"हम्म्म..."
और शायद उसी क्षण उसकी ज़िंदगी एक नए मोड़ पर पहुँच गई।
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