मन की बात
वास्तव में आज की अधिकांश बीमारियाँ अभाव से नहीं, बल्कि अति से उत्पन्न हो रही हैं। पहले लोग कुपोषण से पीड़ित होते थे, आज लोग अतिपोषण, तनाव, असंयम और कृत्रिम जीवनशैली से पीड़ित हैं।
भारतीय ऋषियों ने मनुष्य के लिए केवल सौ वर्ष जीने की कामना नहीं की, बल्कि सौ वर्ष तक स्वस्थ, प्रसन्न और सक्रिय रहने की जीवन-पद्धति भी दी।
वेद कहते हैं—
> "जीवेम शरदः शतम्। पश्येम शरदः शतम्।"
हम सौ वर्ष जिएँ, सौ वर्ष तक देखें, सुनें, समझें और कर्म करते रहें।
परन्तु यह केवल आशीर्वाद नहीं है, इसके पीछे एक संपूर्ण विज्ञान है।
1. स्वास्थ्य का पहला नियम — संयम
भगवद्गीता (6.17) कहती है—
> युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
अर्थात जो व्यक्ति भोजन, विहार, कर्म, निद्रा और जागरण में संतुलित है, वही रोगों से मुक्त रहता है।
आज समस्या यह है कि—
आवश्यकता से अधिक भोजन
आवश्यकता से कम श्रम
आवश्यकता से कम नींद
आवश्यकता से अधिक तनाव
यही रोगों की जड़ है।
2. भोजन औषधि है, मनोरंजन नहीं
आयुर्वेद कहता है—
> "हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्"
अर्थात—
हितकर खाओ।
सीमित खाओ।
ऋतु के अनुसार खाओ।
आज लोग स्वाद के लिए खाते हैं, शरीर की आवश्यकता के लिए नहीं।
ऋषियों का नियम था—
भूख लगे तभी भोजन।
पेट का आधा भाग अन्न।
एक चौथाई जल।
एक चौथाई खाली।
अधिकांश रोग वहीं समाप्त हो जाएँगे यदि केवल यह नियम अपनाया जाए।
3. दिनचर्या सूर्य के साथ
शास्त्र कहते हैं—
> "ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत्"
सूर्योदय से पूर्व उठना स्वास्थ्य का मूल है।
प्राचीन दिनचर्या थी—
ब्रह्ममुहूर्त में जागरण
शौच और स्नान
योग और प्राणायाम
सूर्योपासना
नियमित कर्म
सूर्यास्त के बाद हल्का भोजन
शीघ्र निद्रा
आज मनुष्य रात को जागता है और दिन में सोता है, इसलिए उसकी जैविक घड़ी (Biological Clock) बिगड़ जाती है।
4. शरीर को श्रम चाहिए
आयुर्वेद कहता है—
> "व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं"
व्यायाम से स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
पूर्वजों को अलग से जिम नहीं जाना पड़ता था।
खेती
पैदल चलना
श्रम
योग
यही उनका व्यायाम था।
आज शरीर निष्क्रिय है और भोजन सक्रिय है।
यहीं से रोग शुरू होते हैं।
5. मन की शुद्धि भी आवश्यक
आज अनेक रोग शरीर से पहले मन में उत्पन्न होते हैं।
ईर्ष्या
भय
क्रोध
लोभ
तुलना
ये सब मानसिक विष हैं।
उपनिषद बताते हैं—
> "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः"
मन ही बंधन और मुक्ति का कारण है।
इसलिए—
ध्यान
जप
स्वाध्याय
सत्संग
स्वास्थ्य के उतने ही आवश्यक अंग हैं जितना भोजन।
6. ऋतुचर्या का पालन
आयुर्वेद में हर ऋतु के लिए अलग आहार-विहार बताया गया है।
ग्रीष्म में शीतल आहार, वर्षा में पाचन-सुरक्षा, शरद में शरीर-शोधन, शीतकाल में पौष्टिक भोजन।
आज पूरे वर्ष एक जैसा भोजन करने की प्रवृत्ति ने भी अनेक रोग बढ़ाए हैं।
7. सोलह संस्कारों का उद्देश्य
सोलह संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे।
उनका उद्देश्य था—
शारीरिक स्वास्थ्य
मानसिक संतुलन
सामाजिक उत्तरदायित्व
आध्यात्मिक विकास
अर्थात गर्भ से लेकर मृत्यु तक मनुष्य को संतुलित जीवन जीने की शिक्षा देना।
8. सौ वर्ष तक स्वस्थ रहने का वैदिक सूत्र
यदि पूरे शास्त्रीय ज्ञान को एक सूत्र में कहें तो वह है—
> संयमित आहार + नियमित विहार + पर्याप्त श्रम + शुद्ध विचार + ईश्वर-स्मरण = दीर्घायु और आरोग्य।
रोग केवल शरीर में नहीं जन्म लेते, वे जीवनशैली में जन्म लेते हैं।
इसलिए भारतीय ऋषियों ने औषधियों से पहले आचार पर बल दिया।
आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध वचन है—
> "नित्यं हिताहारविहारसेवी..."
जो व्यक्ति हितकर आहार-विहार अपनाता है, विचारशील रहता है, इन्द्रियों पर संयम रखता है और सत्य तथा धर्म का पालन करता है, उसे रोग स्पर्श नहीं कर पाते।
इसलिए सौ वर्ष तक स्वस्थ और सुखी रहने का रहस्य किसी चमत्कारी औषधि में नहीं, बल्कि संयम, संतुलन और शास्त्रीय जीवन-पद्धति में छिपा है। भारतीय संस्कृति का संदेश स्पष्ट है—
> "जीवन को लम्बा बनाने का प्रयास मत करो, जीवन को संतुलित बनाओ; लम्बाई स्वयं बढ़ जाएगी।"
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