अग्नि शापित है
अग्नि शापित है। उसे माता सीता का शाप मिला है।
आप कहेंगे कि अग्नि का काम तो जलाना ही है। इसमें शाप कैसा?
शाप यह नहीं था कि वह जलाएगी। शाप यह था कि वह किसी की सगी नहीं होगी।
सत्य की भी नहीं।
कहानी त्रेता युग की है।
राजा दशरथ ने राम को वनवास भेज दिया था। राजधर्म, वचन और पुत्र प्रेम के बीच उलझे राजा ने अंततः अपने प्रिय पुत्र को जंगल की ओर विदा कर दिया। राम चले गए। उनके साथ सीता गईं। लक्ष्मण गए। अयोध्या पीछे छूट गई।
एक पिता अपने बेटे का वियोग नहीं सह पाया। दशरथ की मृत्यु हो गई।
जब यह समाचार राम तक पहुंचा तो वे शोक में डूब गए। पुत्र का धर्म था कि पिता का श्राद्ध करे। संयोग से वे गया में थे। श्राद्ध का मुहूर्त निकला जा रहा था। राम और लक्ष्मण आवश्यक सामग्री लेने चले गए।
उधर समय बीत रहा था।
सीता बैठी थीं। उन्होंने सोचा कि यदि मुहूर्त निकल गया तो?
क्या केवल इसलिए श्राद्ध टाल दिया जाए कि पति अभी लौटे नहीं हैं? क्या एक बहू का कोई धर्म नहीं होता?
उन्होंने निर्णय लिया।
गया में फाल्गु नदी के किनारे बैठकर उन्होंने राजा दशरथ का श्राद्ध किया। विधिपूर्वक। श्रद्धा से। अग्नि को साक्षी मानकर। फाल्गु नदी को साक्षी मानकर।
कुछ देर बाद राम लौटे। सीता ने कहा कि श्राद्ध संपन्न हो चुका है।
राम ने आश्चर्य से पूछा, "कैसे? और इसका प्रमाण क्या है?"
प्रश्न गलत नहीं था। सत्य प्रमाण मांगता है।
सीता ने कहा, "फाल्गु नदी से पूछ लीजिए। अग्नि से पूछ लीजिए। दोनों साक्षी हैं।"
सीता ने ही दोनों को राम के सामने प्रस्तुत करके पूछा। फाल्गु नदी मौन रही।
अग्नि से पूछा। अग्नि भी चुप रही।
सत्य छिप गया था। गवाहों ने मुंह फेर लिया था।
जिस व्यक्ति के साथ अन्याय होता है, वह दुखी होता है। लेकिन जिसका सत्य झुठला दिया जाए, उसका दुख और गहरा होता है।
सीता आहत थीं।
उन्होंने फाल्गु नदी को शाप दिया। कहा कि आज के बाद तुम नदी तो कहलाओगी, लेकिन धरती के ऊपर नहीं बहोगी। तुम्हारा जल धरती के नीचे चलेगा। ऊपर से तुम सूखी दिखोगी।
कहते हैं कि गया की फाल्गु नदी आज भी उसी शाप का परिणाम है। नदी है, लेकिन ऊपर से सूखी दिखाई देती है।
फिर सीता ने अग्नि की ओर देखा। अग्नि अब भी मौन थी।
सीता ने कहा, "आज के बाद तुम्हारा कोई मित्र नहीं होगा। तुम्हारे संपर्क में जो आएगा, तुम उसे जला दोगी। तुम किसी की सगी नहीं रहोगी।"
तभी से अग्नि शापित है। वह घर भी जलाती है और दुकान भी।
वह केवल जलाती है। सत्य, असत्य। सब कुछ।
कल रात मैं बहुत देर तक समाचार चैनल देखता रहा।
राजनीति की खबरें थीं। बयान थे। आरोप थे। प्रत्यारोप थे। अमेरिका की खबरें थीं। चीन की खबरें थीं। मुहल्ले के झगड़े की खबरें थीं। एक खबर कहीं कोने में दब गई थी।
कोलकाता में एक सरकारी इमारत में आग लगी थी।
समाचार बता रहे थे कि करीब चार हजार ईवीएम मशीनें उस आग में जल कर नष्ट हो गईं। चार हजार मशीनें। चार हजार डिब्बे। चार हजार इलेक्ट्रॉनिक उपकरण। बेकार मशीनें। वोट डालने के काम आई मशीनें।
लेकिन क्या वे सिर्फ मशीनें थीं?
मुझे नहीं पता। मुझे लगता है मशीनों में केवल तार और सर्किट नहीं होते। उनके साथ लोगों का विश्वास भी जुड़ा होता है।
लोकतंत्र केवल संविधान की किताब से नहीं चलता।
लोकतंत्र विश्वास से चलता है।
एक आदमी सुबह घर से निकलता है। लाइन में खड़ा होता है। अपनी उंगली पर स्याही लगवाता है। बटन दबाता है। फिर घर लौट आता है। उसे नहीं पता कि उसका उम्मीदवार जीतेगा या हारेगा। लेकिन उसे भरोसा होता है कि उसका वोट दर्ज हो गया है। लोकतंत्र उसी भरोसे का नाम है।
मैं उस खबर को देख रहा था और मुझे बार-बार सीता की कहानी याद आ रही थी। अग्नि को क्या पता कि वह क्या जला रही है? कागज जला रही है या किसी संस्था की प्रतिष्ठा? उसे क्या पता कि वह एक कमरे को जला रही है या लाखों लोगों के मन में उठने वाले सवालों को जन्म दे रही है?
अग्नि तो शापित है। वह केवल जलाना जानती है। अग्नि पात्र नहीं। पात्र तो सत्य है।
जल जाना घटना नहीं। घटना है गवाहों की चुप्पी।
त्रेता से गवाह चुप हैं। सत्य लज्जित है।
युद्ध हमेशा तलवारों से नहीं हारते। सभ्यताएं हमेशा बाहरी आक्रमण से नहीं टूटतीं। कई बार केवल चुप्पियों से भी सभ्यताएं हार जाती हैं। समाज हार जाता है। भरोसा हार जाता है। उस दिन सीता का भरोसा हार गया था। तभी उस दिन फाल्गु के हिस्से सूखापन आया। अग्नि के हिस्से अकेलापन आया। और मनुष्य के हिस्से अविश्वास आया।
जब संजय सिन्हा ने कोलकाता की उस आग की खबर देखी, तो उन्हें केवल आग नहीं दिखी। एक पुरानी कथा दिखाई दी। सीता दिखाई दीं। वह क्षण दिखाई दिया जब सत्य मौजूद था और गवाह मौन थे।
दुनिया बदल गई है। राजा बदल गए। राजधानी बदल गई। रथों की जगह हवाई जहाज आ गए। मतपत्रों की जगह मशीनें आ गईं। लेकिन एक चीज आज भी नहीं बदली।
जब सत्य को मौन गवाह मिलता, तब इतिहास शाप लिखता है।
अग्नि आज भी मौन है। मौन गवाह के आगे सत्य पराजित हो जाता है।
नोट-
मैं नहीं जानता कि उन मशीनों में क्या था। मैं यह भी नहीं जानता कि आग कैसे लगी। जांच बताएगी। लेकिन इतना जानता हूं कि जब भी आग लगती है, लोग राख नहीं देखते। लोग यह देखते हैं कि राख किस चीज़ की बनी है। और लोकतंत्र में सबसे महंगी राख मशीनों की नहीं होती, विश्वास की होती है।
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