कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कर्म करो सिर्फ कर्म......
फल की चिंता मत करो।
फल और प्रतिफल की चिंता का अर्थ ही है समीक्षा। ये वाला कर्म करूंगा वो वाला नहीं करूंगा। ये वाला पाप हो गया अब गंगा नहाऊँगा।
कृष्ण ने अपने बाप, दादों, गुरु और परिजनों की हत्या को भी पाप नहीं कहा है।
कृष्ण ने कर्म को धर्म कहा है।
एक उदाहरण से मैं बड़े-बड़े दिग्गजों का मुंह बंद कर दिया है।
जिस द्रोपदी के कपड़े फाड़े गए वो नरक पहुंची थी। ये तो कृष्ण की सखी थी और नरक में थी। जिसने कपड़े फाड़े तो सभी स्वर्ग में थे, दुशासन, कर्ण, दुर्योधन। जो धर्म की ओर से युद्ध कर रहे थे वो नरक में थे और जो अधर्म की ओर से युद्ध में थे वो सभी स्वर्ग में थे।
कर्म करते-करते बात समझ में आ जाती है की कृष्ण क्या कहना चाह रहे हैं।
अगर एक स्त्री मैं रख लूँ और दो बच्चे पैदा कर लूँ तो तुम्हें एतराज है।
तुम्हारे तरीकों पर मैं क्यों न एतराज उठाऊँ .............?
जो रास्ते साधु; संत, महात्मा के लिए तय हैं उन रास्तों पर तुम चल रहे हो। गंगा नहाने से पहले थोड़े पाप कर तो लो। एक आधार भूत सत्य को समझ लो यदि पुण्य ज्यादा हैं तो स्वर्ग जाओ, पाप ज्यादा तो नरक जाओ। जब पाप पुण्य का साम्य है तो धरती पर रहो।
ईश्वर भी स्वर्ग में जन्म नहीं लेता है धरती पर लेता है। क्यों कि धरती पर जीवन है। धरती पर आनंद का उपभोग है। पहले जीवन को जी तो लो। जब सारी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाओ, तब गलत सही की समीक्षा करना। कहीं कोई गलती तो सुधार और अपराध तो प्रायश्चित करना।
इसमें गंगा कहां से आ गई बीच में........ ?
कुछ दिन पहले एक बुजुर्ग दंपति मुझसे मिले तो मैंने उनसे पूछ लिया....
आप इन कथा भागवतों में क्या करते हो जाकर.... ?
आप सत्तर साल के हो एक पच्चीस साल का लड़का तुम्हें भागवत सुनाएगा....... ?
तुम्हें पचास, चालीस, तीस साल के लोगों को बताना चाहिए कि ये रास्ता कैसे तय किया जाता है। जो अनुभव से आया है वही उपयोगी है। जो तुमने जाना है वही उपयोगी है। ये बीस साल का कथा वाचक बताएगा कि मोक्ष कैसे होता....... ?
तो आप क्या झक मराते रहे सत्तर साल तक।
एक सरकारी नौकरी के अलावा क्या उपलब्धि है आपकी। उसमें भी क्या तीर मार लिया आपने।
अगर वो न मिलती तो........ ?
इस बात को ठीक से समझ लेना.......
यदि साठ की उम्र तक पहुंचते हुए कुछ किया नहीं तो, साठ के बाद के सभी रास्ते नरक में ही खुलते हैं। खूब पोथी पुराण सुनना, खूब गंगा नहाना.........लेकिन जाओगे नरक में ही।
ये जगत कर्मशील लोगों के लिए है। जब समय आएगा मोक्ष हो ही जाएगा और अगर नहीं भी हुआ तो महा प्रलय होना तो तय है ही। उस दिन महा मोक्ष हो जाएगा।
यही बात कृष्ण कह रहे हैं सिर्फ कर्म करो फल की चिंता में व्यर्थ समय बरबाद मत करो....... अगर कर्म से दूर हो तो कोई भक्ति शक्ति काम नहीं आने वाली है......भक्ति और शक्ति तो कर्मशील लोगों के लिए बनी है।
जब सोमनाथ का मंदिर टूटा तब उसमें साढ़े सात सौ पुजारी थे वहां। वहां शिव लिंग हवा में लटका रहता था। उसमें इतना प्रकाश होता था कि रात्री में भी पुस्तक पढ़ी जा सकती थी।
जब गजनवी ने उसे देखा तो कहा, तो सीधे शब्दों में कहा जरूर इसके चारों ओर कोई चुंबकीय क्षेत्र है। उसने नहीं कहा कोई आत्मा, परमात्मा..... सब बकवास। उसने आसपास कि दीवारें गिरवा दीं। शिवलिंग जमीन पर आकर गिरा, टूटा। उसमें जवाहरात भरे हुए थे। हाथियों, ऊंटों पर भरकर हमारी इज्जत को ले गया। उसके बाद लुटेरों में ये धारणा बनी कि हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों में धन छिपाते हैं। मूर्तियाँ खंडित किये जाने के पीछे ये भी एक बड़ा कारण रहा है। ये पाखंडी अब भी न सुधरे। इतना सब होने के बाद भी हम सब धन से तो कंगाल हैं ही अक्ल से भी कंगाल हैं। अब भी हमें अक्ल नहीं आई है।
तुम अपनी मूर्तियाँ पकड़े रहे। नासा, जर्मनी, ब्रिटेन ये तुम्हें लूट कर ले गया। जिन कारणों से हिंदुस्तान सोने की चिड़िया था वो तो सभी लूट कर अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी चले गए। अगर अक्ल न हो तो वो भी कोई काम के नहीं हैं।
हमने कभी अपने विज्ञान का सम्मान नहीं किया।
अफसोस हमने कभी अपने वैज्ञानिकों का भी सम्मान नहीं किया।
हमारा सारा विज्ञान तो चोरी गया ही...... हमारे वैज्ञानिक भी पलायन कर गए। हम अभी मूर्तियाँ पकड़े बैठे हैं। इससे न कुछ हुआ है और न ही कुछ होगा। बस इससे पाखंड होता है सो अपने चरम सीमा पर है।
मेरा कहने का अर्थ इतना ही है हमें विज्ञान से ज्यादा महत्व व्यक्ति को दिया इस कारण से व्यक्ति तो गया। विज्ञान को हमने कभी महत्वपूर्ण माना नहीं। तो हमारे पास दोनों नहीं हैं।
मैं साधारण सी बात भी कहता हूँ तो लोगों को लगता है ये तो कोई दूसरी दुनिया की बात है.....या फिर वो महात्मा हैं तो कर सकते हैं। तुम्हीं महात्मा हो, परमात्मा भी हो और मनुष्य भी। ये तीनों गुण सभी में मौजूद हैं...... अपना आकलन कभी कम नहीं करना।
मैंने विज्ञान और अध्यात्म की साफ परिभाषा की है।
जो दृष्टि के दायरे में है वो विज्ञान है।
जो दृष्टि से परे का विज्ञान है वो अध्यात्म है।
दोनों ही विज्ञान हैं।
एक इस जगत का विज्ञान,
दूसरा परमात्मा का विज्ञान
तीसरा इस जगत से उस जगत में आने जाने का विज्ञान |
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