Tuesday, May 26, 2026

समर्पण

 क्या सच में जीवन को हर समय नियंत्रित करने की कोशिश ही हमारे भीतर की सबसे बड़ी बेचैनी है… क्या यही कारण है कि इंसान लगातार थका हुआ, डरा हुआ और भीतर से अस्थिर महसूस करता है… क्योंकि सामान्यतः मनुष्य दो अवस्थाओं में जीता है… या तो किसी चीज़ को खो देने का डर… या किसी चीज़ को पा लेने की इच्छा। यही डर और इच्छा मन को लगातार भागते रहने पर मजबूर करते हैं। कभी भविष्य की चिंता… कभी परिणामों का भय… कभी यह बेचैनी कि सब कुछ वैसा ही होना चाहिए जैसा मन चाहता है। लेकिन आध्यात्मिक परंपराएँ एक तीसरी अवस्था की बात करती हैं… समर्पण की अवस्था। यह अवस्था  सकारात्मक सोच से भी गहरी मानी गई है। क्योंकि सकारात्मक सोच में भी कहीं न कहीं मन परिणाम को पकड़ना चाहता है… लेकिन समर्पण में पकड़ धीरे-धीरे ढीली होने लगती है। यहाँ एक बहुत गहरी बात समझना आवश्यक है… समर्पण का अर्थ हार मान लेना नहीं है… यह कमजोरी नहीं है… यह भागना भी नहीं है। समर्पण का अर्थ है भीतर के अत्यधिक प्रतिरोध को छोड़ देना। अर्थात हर चीज़ को नियंत्रित करने की बेचैनी कम होने लगना। जब व्यक्ति हर समय भविष्य को अपने अनुसार मोड़ने की कोशिश छोड़ देता है… तब भीतर एक नई शांति जन्म लेने लगती है। क्योंकि वास्तविक पीड़ा केवल परिस्थितियों से नहीं आती… बल्कि उनसे लड़ने की निरंतर मानसिक थकान से आती है। मन लगातार कहता रहता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए था… यह मेरे अनुसार क्यों नहीं हुआ… भविष्य वैसा ही होना चाहिए जैसा मैं चाहता हूँ। और यही संघर्ष भीतर तनाव पैदा करता है। लेकिन जब धीरे-धीरे व्यक्ति जीवन के प्रवाह पर विश्वास करना सीखता है… तब मन का बोझ हल्का होने लगता है। अध्यात्म कहता है कि समर्पण का अर्थ निष्क्रिय हो जाना नहीं है… बल्कि कर्म करते हुए भी भीतर से शांत रहना है। अर्थात प्रयास करना… लेकिन परिणामों से अत्यधिक चिपकना नहीं। जब व्यक्ति भीतर trust महसूस करने लगता है… तब जीवन को पकड़ने की मजबूरी कम होने लगती है। और जैसे-जैसे यह पकड़ ढीली होती है… वैसे-वैसे मन का शोर भी शांत होने लगता है। अब व्यक्ति केवल विचारों से संचालित नहीं होता… बल्कि जागरूकता और स्वीकार की अवस्था में आने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि विचार समाप्त हो जाते हैं… बल्कि यह कि व्यक्ति विचारों का गुलाम कम होने लगता है। पहले हर नकारात्मक विचार उसे हिला देता था… अब वह उन्हें आते-जाते देख पाता है। पहले हर परिस्थिति को नियंत्रित करने की तीव्र इच्छा रहती थी… अब भीतर एक गहरा विश्वास रहने लगता है कि जीवन केवल नियंत्रण से नहीं चलता। यही कारण है कि समर्पण को गहरी शांति का द्वार कहा गया है। क्योंकि जब मन का अत्यधिक संघर्ष समाप्त होने लगता है… तब भीतर मौन प्रकट होने लगता है। और उस मौन में व्यक्ति पहली बार महसूस करता है कि जीवन हर समय उसके विरुद्ध नहीं था… वह केवल उसे बहना सिखा रहा था। समर्पण का अर्थ जीवन से हारना नहीं… बल्कि जीवन के साथ चलना सीखना है। जैसे नदी बहती है… बिना हर मोड़ से लड़ने के… वैसे ही जब इंसान भीतर से स्वीकार करना सीखता है… तब उसकी चेतना हल्की होने लगती है। और उसी हल्केपन में एक ऐसी शांति जन्म लेती है… जिसे शब्दों में पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता

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