Tuesday, May 26, 2026

वो बोली मैंने कहा

 वो बोली –

इतने बरसों बाद मिले हो,

क्या अब भी मुझसे कोई गिला है?


मैंने कहा –

गिला तो ज़माने से है साहिबा,

तुमसे तो बस बेइंतिहा ज़ख़्म मिला है! 


वो बोली –

सुनो, इतने लोगों के बीच में,

क्या कभी मेरा ख़्याल आता है?


मैंने कहा –

ख़्याल तो उनका आता है जिन्हें हम भूल जाएँ,

तुम तो वो धड़कन हो,

जिस पर हर साया ठहर जाता है।​


वो बोली –

सुना है अब बहुत कम बोलते हो,

ख़ुद में ही खोए रहते हो?


मैंने कहा –

जब अंदर का शोर बेहिसाब हो जाए,

तो बाहर की आवाज़ें फीकी लगने लगती हैं, 

मैंने बोलना नहीं… तुमने सुनना बन्द कर दिया है।


वो बोली –

तो क्या आज भी मेरा नाम सुनकर,

तुम्हारे हाथ काँप जाते हैं?


मैंने कहा –

हाथ तो नहीं काँपते अब…

मगर हाँ, सीने में एक पल को साँसे रुक जाती है,

जैसे किसी पुराने घाव को फिर कोई ठंडी हवा छू जाती है।


​वो बोली –

पर तुम भी अब बदल गए हो शायद,

तुम्हारी आँखों में वो पागलपन नज़र नहीं आता।


मैंने कहा –

पागलपन को वक़्त की समझदारी निगल गई,

और दिल की आग का धुआँ बाहर दिखता भी तो नही।


वो बोली –

तुमने तो कहा था, मेरे बिना मर जाओगे,

फिर देखो… तुम तो जी रहे हो!


मैंने कहा –

साँसें चल रही हैं, इसे जीना नहीं कहते,

यह तो बस उस वादे का भरम रखना है,

जो मैंने ख़ुद से किया था—

कि तुम्हें कभी गुमनाम नहीं होने दूँगा।

कि तुम्हें कभी बदनाम नहीं होने दूँगा।


वो बोली –

एक बात पूछूँ...क्या तुम्हें मेरी ज़रा भी कमी महसूस नहीं होती?


मैंने कहा –

कमी तो अमावस के आसमां को भी होती है चांद की,

मगर वो रातों को अंधेरा ओढ़कर चुपचाप गुज़ार देता है ना,

मैं भी बस अपनी तन्हाई का अंधेरा ओढ़ लेता हूँ।


वो बोली –

अगर मैं कहूँ कि मुझे आज भी तुम्हारी परवाह है,

तो क्या तुम यक़ीन करोगे?


मैंने कहा –

यक़ीन और तुम… दोनों एक ही नाव में डूबे थे,

अब परवाह की पतवार लेकर भी आओगी,

तो भी वो भावों का समंदर लौटकर नहीं आएगा।


वो बोली –

तो क्या मुझे माफ़ कर पाना इतना मुश्किल है?


मैंने कहा –

माफ़ तो तुम्हें उसी दिन कर दिया था जिस दिन तुम गई थीं,

मुश्किल तो ख़ुद को माफ़ करना है…

कि मैंने एक रेत का महल बनाया था।

कि मैने उसमें ख़ुदा बनाकर तुमको बिठाया था।


वो बोली –

तो अब हमारे बीच क्या बचा है?


मैंने कहा –

एक अधूरी नज़्म कह लो... 

एक अनकहा अलविदा कह लो..क्या फर्क पड़ता है? 

अब तो एक ऐसा सन्नाटा बीच में बचा है,

जिसे तुम चाहकर भी तोड़ नहीं सकती,

और मैं चाहकर भी समेट नहीं सकता।


​वो बोली –

तो क्या हम फिर कभी नही मिलेंगे?


मैंने कहा –

हाँ मिलेंगे ना, ज़रूर मिलेंगे , पर इस जहाँ में नहीं,

उस जहाँ में,,, 

जहाँ सिर्फ़ तुम होगी, मैं हूँगा, और कोई अलविदा नहीं होगा।

अच्छा तुमने इतने सवाल पूछे, एक सवाल मैं पूछूँ तुमसे...? 

क्या है कोई ऐसी जगह?? 

No comments:

Post a Comment