आंतरिक जागरूकता • ऊर्जा का प्रवाह • स्वयं से मिलन"
कुछ समय से भीतर एक अजीब-सी हलचल महसूस हो रही थी।
जैसे शरीर शांत हो, लेकिन भीतर कहीं कोई अग्नि लगातार जल रही हो।
बाहर से सब सामान्य दिखता था, पर अंदर जैसे बहुत कुछ एक साथ चल रहा था।
कभी अचानक मन भारी हो जाता,
कभी बिना किसी कारण बेचैनी घेर लेती,
कभी लगता जैसे साँसें तो चल रही हैं,
पर भीतर का जीवन कहीं रुक-सा गया है।
फिर धीरे-धीरे समझ आने लगा कि यह केवल थकान नहीं थी।
यह भीतर जमा हुई ऊर्जा थी।
एक ऐसी ऊर्जा, जो जन्म लेना चाहती थी।
जो बहना चाहती थी।
जो सृजन करना चाहती थी।
लेकिन मन उसे लगातार रोक रहा था।
हमारा मन अक्सर हर चीज़ को नियंत्रित करना चाहता है।
वह हर भावना को नाम देना चाहता है,
हर अनुभव का कारण ढूँढ़ना चाहता है,
हर ऊर्जा को किसी दिशा में धकेलना चाहता है।
पर कुछ ऊर्जाएँ ऐसी होती हैं
जिन्हें दिशा नहीं,
सिर्फ स्वीकार चाहिए होता है।
मैंने पहली बार अपने भीतर उस ऊर्जा को बिना दबाए महसूस किया।
बिना उसे बदलने की कोशिश किए।
बिना उससे डरकर भागे।
और तभी एहसास हुआ
भीतर जो संघर्ष था,
वह दुनिया से नहीं,
खुद से था।
एक हिस्सा उड़ना चाहता था,
दूसरा हिस्सा डरता था।
एक हिस्सा बदलना चाहता था,
दूसरा पुराने खोल से चिपका हुआ था।
यही खींचतान भीतर गाँठ बनाती रही।
ऊर्जा बहना चाहती थी,
लेकिन विचार उसे रोक लेते थे।
भावनाएँ बाहर आना चाहती थीं,
लेकिन आदतें उन्हें कैद कर लेती थीं।
धीरे-धीरे शरीर संकेत देने लगता है।
क्योंकि शरीर कभी झूठ नहीं बोलता।
वह हमेशा बता देता है
कि भीतर क्या अनकहा रह गया है।
जब मैंने खुद को शांत होकर सुनना शुरू किया,
तब महसूस हुआ कि मेरे भीतर एक बहुत गहरी शक्ति मौजूद है।
एक ऐसी शक्ति जो केवल जीना नहीं चाहती,
बल्कि पूर्णता से खिलना चाहती है।
और शायद यही जीवन की सबसे सुंदर यात्रा है
अपने भीतर लौट आना।
हम अक्सर उत्तर बाहर खोजते हैं।
लोगों में, शब्दों में, सलाहों में,
लेकिन कुछ उत्तर केवल मौन में मिलते हैं।
जब हम रुकते हैं…
धीरे होते हैं…
अपने भीतर उतरते हैं…
तब अचानक बहुत कुछ स्पष्ट होने लगता है।
हर पीड़ा कुछ कहती है।
हर बेचैनी किसी नए जन्म का संकेत होती है।
हर टूटन के भीतर
एक नया विस्तार छिपा होता है।
अब समझ आता है कि
हमें हर बार तुरंत ठीक होने की आवश्यकता नहीं होती।
कभी-कभी जीवन हमें रोकता है
ताकि हम स्वयं को सुन सकें।
इसलिए अब मैं खुद से लड़ना नहीं चाहता/चाहती।
मैं अपनी ऊर्जा को महसूस करना चाहता/चाहती हूँ।
उसे बहने देना चाहता/चाहती हूँ।
उसे प्रेम से स्वीकार करना चाहता/चाहती हूँ।
धीरे-धीरे…
बिना किसी जल्दबाज़ी के…
क्योंकि आत्मा की यात्रा में
कोई दौड़ नहीं होती।
यह यात्रा महसूस करने की है।
घुलने की है।
स्वयं से एक होने की है।
और जब हम सच में अपने भीतर उतरते हैं,
तब पता चलता है
हम कभी खोए हुए थे ही नहीं।
हम हमेशा से रास्ते पर थे।
बस अब
पहली बार
हम स्वयं को देख पा रहे हैं।
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