जब भी इंसान अपनी हिंसा को धर्म का नाम देता है, उसी क्षण धर्म की आत्मा मर जाती है। इतिहास उठाकर देख लो — जितना खून राजनीति ने नहीं बहाया, उससे कहीं ज्यादा खून तथाकथित धार्मिक पवित्रताओं ने बहाया है। और सबसे दुखद बात यह है कि हर युग में हत्यारे अपने हाथ धोकर मंदिरों, मस्जिदों और तीर्थों में खड़े हो जाते हैं, मानो भगवान उनकी क्रूरता का ठेकेदार हो। कोई बकरे की गर्दन काट रहा है, कोई मुर्गे को तड़पा रहा है, कोई किसी निरीह पशु को रस्सियों से बाँधकर भीड़ के सामने घसीट रहा है, और फिर उसी खून से सने हाथ जोड़कर कहता है — “यह आस्था है।” अगर यही आस्था है तो फिर पागलपन किसे कहोगे?
मनुष्य बड़ा चतुर है, वह अपने पापों को भी पवित्र शब्दों में छुपा लेता है। हिंसा को “कुर्बानी” कह दो, हत्या को “बलि” कह दो, क्रूरता को “परंपरा” कह दो — और फिर सदियों तक लोग बिना सोचे-समझे उसी अंधेपन को ढोते रहते हैं। किसी ने कभी रुककर यह नहीं पूछा कि क्या सच में परमात्मा को खून चाहिए? अगर भगवान इतना ही निर्दयी है कि वह किसी मासूम जानवर की चीख सुनकर प्रसन्न होता है, तो फिर ऐसा भगवान भगवान नहीं, इंसान की बीमार मानसिकता का प्रतिबिंब है।
सोचो, जिस बकरे को तुम रस्सियों से बाँधकर ला रहे हो, उसकी आँखों में कितना डर होता होगा। वह मरना नहीं चाहता। कोई भी जीव मरना नहीं चाहता। जीवन हर प्राणी को प्रिय है। लेकिन आदमी ने अपने स्वाद, अपनी परंपरा, अपने त्योहार और अपने पागल विश्वासों को इतना बड़ा बना लिया कि उसे किसी जीव की पीड़ा दिखाई ही नहीं देती। वह बच्चे को गोद में लेकर प्यार करता है और उसी घर के बाहर किसी जानवर का गला कटता देखता है। यह कैसी दोहरी चेतना है? यही विभाजित मनुष्य की बीमारी है।
और मज़े की बात देखो — वही लोग जो इंसानियत, दया और प्रेम के बड़े-बड़े भाषण देते हैं, त्योहार आते ही जानवरों की मंडियाँ सजाने लगते हैं। ट्रकों में ठूँस-ठूँस कर जानवर लाए जाते हैं, घंटों भूखा-प्यासा रखा जाता है, रस्सियों से बाँधा जाता है, पिंजरों में कैद किया जाता है, और फिर कहा जाता है — “यह ईश्वर के नाम पर है।” अगर ईश्वर सच में है, तो सबसे पहले वह ऐसे धार्मिक व्यापारियों पर थूकेगा। क्योंकि परमात्मा जीवन है, मृत्यु का उत्सव नहीं।
अहिंसा कोई नैतिक नियम नहीं है, अहिंसा चेतना की सुगंध है। जिस आदमी के भीतर ध्यान पैदा होता है, वह किसी फूल को भी बिना संवेदना के नहीं तोड़ सकता। उसकी आँखों में करुणा आ जाती है। वह चींटी को बचाकर चलता है। लेकिन जिस समाज में ध्यान मर जाता है, वहाँ बलि शुरू हो जाती है। वहाँ लोग पत्थरों की मूर्तियों के आगे सिर झुकाते हैं लेकिन जीवित प्राणियों की गर्दन काट देते हैं। इससे बड़ा पाखंड पृथ्वी पर कभी नहीं हुआ।
धर्म अगर तुम्हें संवेदनशील नहीं बनाता, तो वह धर्म नहीं है। अगर तुम्हारी पूजा किसी की जान लेकर पूरी होती है, तो वह पूजा नहीं अपराध है। अगर तुम्हारा त्योहार किसी मासूम की चीख पर टिका है, तो वह उत्सव नहीं, सामूहिक पागलपन है। और यह बात केवल किसी एक धर्म की नहीं है — जहाँ भी हिंसा है, वहाँ अधर्म है। चाहे वह किसी भी झंडे के नीचे क्यों न खड़ी हो।
आज दुनिया को नए मंदिरों की जरूरत नहीं है, नए मजहबों की जरूरत नहीं है, नई किताबों की जरूरत नहीं है। दुनिया को केवल एक चीज की जरूरत है — करुणा। क्योंकि करुणा ही धर्म का हृदय है। जिस दिन इंसान किसी जानवर की आँखों में अपना ही भय देख लेगा, उसी दिन उसकी चेतना का जन्म होगा। उस दिन उसे समझ आएगा कि जिसे वह “कुर्बानी” कह रहा था, वह असल में उसकी अपनी बर्बरता थी।
भगवान को कभी किसी बकरे का सिर नहीं चाहिए था। भगवान को चाहिए था कि तुम अपना अहंकार काटो, अपनी हिंसा काटो, अपनी क्रूरता काटो। लेकिन वह कठिन था, इसलिए इंसान ने आसान रास्ता चुना — अपनी जगह किसी बेबस जानवर की गर्दन काट दी। यही आदमी की सबसे बड़ी चालाकी है। वह खुद बदलना नहीं चाहता, इसलिए किसी और को कुर्बान कर देता है।
याद रखना, आने वाला समय उन लोगों का होगा जो जीवन का सम्मान करेंगे। क्योंकि पृथ्वी अब और खून नहीं सह सकती। बहुत युद्ध हो चुके, बहुत हत्याएँ हो चुकीं, बहुत नफरत फैल चुकी। अब अगर धर्म को बचाना है, तो मंदिरों और मस्जिदों से पहले इंसान के हृदय में करुणा जगानी होगी। वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी — “क्या सच में हमारे पूर्वज इतने अंधे थे कि भगवान के नाम पर जानवरों का खून बहाते थे?
No comments:
Post a Comment