अध्ययन और ज्ञान की अधिकता से मनुष्य विद्वान या ज्ञानी (जानकार) तो बन जाता है, परंतु समझदार नहीं बन जाता।
ज्ञान प्राय: समझदारी में बाधक होता है।
दैनंदिन के व्यवहार में विद्वान लोग सामान्य साक्षर, यहां तक कि निरक्षर लोगों की तुलना में अधिक गलतियां करते हैं। कारण वे अपने सामने और समय की समस्याओं का समाधान किसी दूसरे देशकाल की मिलते-जलती घटनाओं के समाधान से पाना चाहते हैं, और इसलिए प्राय: भयंकर गलतियां करते हैं,। उनकी ओर ध्यान दिलाने पर भी सुधार नहीं कर पाते अधिक से अधिक किसी दूसरे पुस्तक की सूची उसका समाधान करना चाहते हैं।
अशिक्षित या कुशिक्षित लोगों के लिए एक अपशब्द है, अनाड़ी।
बहुपद क्षेत्र लोगों के लिए ठसदिमाग - अर्थात जिनका दिमाग ठसाठस भरा हुआ है और जिसमें किसी नए या ज्ञान के लिए जगह ही नहीं रह गई है। इसी को अंग्रेजी में ब्लॉक हेडेड कहते हैं जो भी एक अपशब्द है ।
मुझे ऐसा लगता है कि शठ के श्रुति दोष के कारण इसे सठ/साठ मानकर सठियाना मुहावरा बना है। कारण, हमारी परंपरा में वयोवृद्ध लोगों को ज्ञानवृद्ध माना जाता रहा है, न कि ज्ञानजड़। इसे लेकर लोक साहित्य तक में कहानियां भरी पड़ी हैं। जो भी हो, इस जड़ता के पीछे किसी तरह का दैन्य नहीं,।, अपितु अहंकार हुआ करता है।
इसका बहुत सुंदर उदाहरण सिकंदर के साथ आए यूनानी लेखकों ने दिया है। कहते हैं सिकंदर से सुकरात ने कहा था कि यदि तुम भारत जाना तो वहां से एक दार्शनिक को भी ले आना। उसके अनुमदन में सिकंदर ने वापसी से पहले अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे ऐसा कोई दार्शनिक बुला कर लायें। वे एक दार्शनिक के पास पहुंचे और उसे यह बात कर कि सिकंदर कितना महान है और उसने आपको मिलने के लिए बुलाया है, चलने का प्रस्ताव रखा और सोचा कि वह गौरवनित अनुभव करके साथ चलेगा, परंतु उन्हें उत्तर में यह सुनने को मिला, 'मिलना वह चाहता है तो उसे आना चाहिए था, मुझे उससे मिलने की जरूरत नहीं। मैं उसके पास क्यों चलूंगा। लौटकर उन्होंने सिकंदर को उसका उत्तर बताया तो सिकंदर स्वयं उससे मिलने गया।
प्राचीन काल में भाषा का संकट दूर करने के लिए प्राय प्रतीकों में बात हुआ करती थी। सिकंदर ने उसके सामने मक्खन से लबालब भरा एक प्याला पेश किया, जिसका अर्थ था हमारा ग्रीस ज्ञान से लबालब भरा हुआ है, उसमें कोई कमी नहीं है। उस दार्शनिक ने एक तिनका उठाया और भरे हुए मक्खन के प्याले में उसे खोंस दिया। जिसका अर्थ था कि ज्ञान जिस भी पराकाष्ठा पर क्यों न पहुंचा हो, उसमें भी नये ज्ञान की संभावना बनी रहती है।
कहते है सिकंदर उसके सामने नतमस्तक हो गया था। याद नहीं उन विवरणों में उस भारतीय दार्शनिक का नाम दिया हुआ था, या नहीं । परंतु कहते हैं उसके बाद सिकंदर को यह विचार सूझा था कि ज्ञान के दो केंद्र बनाने चाहिए, एक यूनानी ज्ञान के लिए भारत में और दूसरा भारतीय ज्ञान के लिए यूनान में।
जैसे पुस्तककीय ज्ञान मनुष्य को समझदार नहीं बनाता, प्रतिभा भी उसे समझदार नहीं बनाती। प्रत्येक प्रतिभाशाली व्यक्ति समझदार नहीं होता, यद्यपि यह भ्रम पाल लेता है। वह प्रायः इस आत्ममुग्धता से इतना ग्रस्त हो जाता है कि अपने भावोंच्छ्वास को ही ऊंचे दर्जे का विचार मान लेता है, और अपनी समकक्षता में किसी चिंतक को रखता ही नहीं । लोग भी उसके बहकावे में आ जाते हैं और वे भी उसे दार्शनिक मान लेते हैं। इस तरह के तरंगी साहित्यकार और दर्शनकार अपने ही समाज के लिए खतरनाक सिद्ध होते हैं, इसका एक उदाहरण इकबाल है जो भारतीय मुसलमानों को कबीलाई जड़ता की ओर ले जाना चाहते थे। ऐसे लोग दार्शनिक नहीं होते मूडी होते हैं।
चिंतक प्रतिभाशून्य नहीं होता। प्रतिभा उसके लिए गौण होती है, परिश्रम उसकी असली पूंजी है।
अनेक लोग असाधारण प्रतिभा के धनी होते हैं, छोटी उम्र में ही वे कला, संगीत, मूर्ति निर्माण, कविता आदि में चकित कर देने वाली रचनाएं आरंभ कर देते हैं। अल्प आयु में ही उनकी प्रतिभा की पहचान कर ली जाती है, इससे मिलने वाली प्रशस्ति उनके आत्मविश्वास को पंख दे देती है। प्रखर मेधा के लोग चुटकी बजाते ही किसी चीज को समझ जाने की अपनी योग्यता के कारण हुई किसी विषय में बहुत लंबा समय नहीं लगते । इससे उन्हें बोरियत होती है । परंतु ऐसे लोग कभी कुछ भी ऐसा नहीं दे पाते हैं स्थायी महत्व का हो। वे बहुज्ञ होते हैं, वाग्विदग्ध होते हैं और अपनी प्रस्तुति से मंत्रमुग्ध कर देते है, परंतु किसी विषय की बहुत गहरी समझ नहीं रखते हैं क्योंकि झटपट नतीजे पर पहुंच जाने के कारण उस लंबे ऊहापोह से नहीं गुजरते जो युगांतरकारी दृष्टि के लिए जरूरी है।
श्रम प्रतिभा को धार और विचार को ऊंचाई देता है। श्रम अपने आप में एक साधना है वह जिन भी परिस्थितियों में करना पड़े , सिद्धि उसके बिना संभव नहीं।
जो लोग प्रतिभा और शास्त्रीय ज्ञान के बल पर जल्दी से जल्दी किसी मुकाम पर पहुंचना चाहते हैं वे प्रबंधन और प्रशासन और संचालन के लिए सबसे उपयुक्त होते है और यहां उनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता । परंतु हम जानते हैं कि वे नया कुछ नहीं देते, जो भी सुलभ है उसे व्यवस्थित करते हैं।
अर्जित ज्ञान हमें बुद्धिमान नहीं बनाता। हमारी अपनी बुद्धि के उपयोग में बाधक होता है। इसलिए पुस्तकों से वंचित लोग कभी-कभी ज्ञानजड़ लोगों से अधिक समझदार होते हैं।
आज की मुख्य समस्या यह है कि बुद्धिजीवी यह तक समझने को तैयार नहीं कि अपने ही समाज को समझने को तैयार नहीं और कोसते उस समाज को हैं जिसका विश्वास उन्होंने उसको दिया है ।
यथार्थ का ज्ञान सिद्धांत से शुरू नहीं होता समाज की समझ से शुरू होता है और नये सिद्धांत उससे उभरते हैं।
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