रात अपने साथ सिर्फ अंधेरा नहीं लाती, बल्कि एक ऐसी खामोशी लेकर आती है जिसमें इंसान खुद से ज्यादा मिलने लगता है। दिनभर हम जितना भी भागते हैं, जितना भी शोर और लोगों के बीच रहते हैं, रात आते-आते सब धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है। और उसी खालीपन में मन की वो आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं जिन्हें हम दिन में दबा देते हैं या नजरअंदाज कर देते हैं।
कई बार ऐसा होता है कि नींद गहरी होते हुए भी अचानक आँख खुल जाती है, जैसे किसी ने अंदर से झकझोर दिया हो। बाहर सब शांत होता है, लेकिन अंदर एक अनजानी बेचैनी चल रही होती है। उस वक्त लगता है जैसे दिमाग किसी अधूरे विचार को पकड़कर वापस खींच लाया हो। शायद कोई चिंता, कोई दबा हुआ डर या कोई पुरानी बात जो दिन में जगह नहीं पा सकी थी, वही रात की खामोशी में सामने आ जाती है।
और फिर नींद के बीच सपनों की दुनिया शुरू होती है, जहाँ चीजें सीधे-सीधे नहीं बल्कि इशारों में होती हैं। कभी ऐसा लगता है जैसे हम ऊँचाई से गिर रहे हैं और कुछ भी पकड़ में नहीं आ रहा। उस पल का डर असल में किसी असुरक्षा का ही रूप होता है, जैसे जीवन में कहीं न कहीं संतुलन डगमगा रहा हो और मन उसे शब्दों में नहीं, बल्कि अनुभव में दिखा रहा हो।
रात के सन्नाटे में कई लोगों को ऐसा भी महसूस होता है कि किसी ने उनका नाम पुकारा है, जबकि आसपास कोई नहीं होता। यह पल थोड़ा अजीब जरूर होता है, लेकिन यह भी उस दिमाग की ही एक परत है जो पुरानी आवाज़ों, पुराने रिश्तों और गहरी भावनाओं को कहीं भीतर संभालकर रखता है और कभी-कभी उन्हें अचानक बाहर छोड़ देता है, बिना किसी चेतावनी के।
इसी तरह जब पूरा घर शांत हो और फिर भी ऐसा लगे कि कोई चल रहा है या पास से गुजर रहा है, तो मन तुरंत सतर्क हो जाता है। असल में यह बाहर की दुनिया से ज्यादा भीतर की सतर्कता होती है, जहाँ दिमाग हर छोटी हलचल को जरूरत से ज्यादा बड़ा बना देता है। खामोशी जितनी गहरी होती है, कल्पनाएँ उतनी ही तेज़ हो जाती हैं।
और फिर अचानक कोई पुरानी बात, कोई पुराना चेहरा या कोई अधूरा पल याद आ जाना, जैसे वक्त एक पल के लिए पीछे चला गया हो। यह यादें बिना वजह नहीं आतीं, बल्कि कहीं न कहीं मन के अंदर पड़े अधूरे अनुभवों की परतें होती हैं जो समय-समय पर खुद को याद दिलाती रहती हैं कि वे अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
असल में रात किसी रहस्य की तरह नहीं, बल्कि एक आईने की तरह है। जो भी हमारे भीतर दिनभर दबा रहता है, वह धीरे-धीरे उसी आईने में दिखने लगता है। फर्क बस इतना है कि दिन में हम दुनिया देखते हैं और रात में दुनिया नहीं, खुद को देखने लगते हैं।
1. जो लोग "मैं हूँ" समझते हैं (सामान्य या सीमित समझ)इमेज के बाईं ओर (Left Side) उन चीजों को दिखाया गया है जिन्हें लोग आमतौर पर अपना अस्तित्व मान लेते हैं:विचार: लोग खुद को देखने वाला या जानने वाला समझते हैं ("मैं पूरे ब्रह्मांड की एक आँख हूँ")।सांसारिक जुड़ाव: इसमें ब्रह्मांड, विचार, स्मृतियाँ, सपने, लोग और घटनाएँ शामिल हैं।बंधन: नीचे स्पष्ट किया गया है कि मन विचार प्रकट करता है \(\rightarrow \) माया उसे दृश्य बना देती है \(\rightarrow \) दृश्य अनुभव का जाल बुनता है। यह स्थिति भी बंधन (माया) के क्षेत्र में ही आती है।द्रष्टा और दृश्य: जब तक देखने के लिए कोई वस्तु (दृश्य) मौजूद है, तब तक ही देखने वाला (द्रष्टा) है। जहाँ दृश्य है, वहाँ मन और माया भी है।2. असली "मैं हूँ" का बोध (वास्तविक आत्म-ज्ञान)इमेज के दाहिनी ओर (Right Side) और केंद्र में वास्तविक आत्म-स्वरूप को समझाया गया है:शून्य और अनंत: यहाँ न कोई दृश्य है, न कोई देखने वाला (द्रष्टा)। न मन है, न माया। न समय है, न कोई बदलाव।अखंड ध्वनि: सब कुछ पूरी तरह अचल (स्थिर) और रुका हुआ है। केवल एक 'अखंड ध्वनि' (नाद या अनहद नाद) शेष रहती है।
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