भारत, स्वदेशी तकनीक और आर्थिक सच्चाई: एक असहज आत्ममंथन
आज अगर हम ईमानदारी से अपने चारों ओर देखें और खुद से एक साधारण सवाल पूछें हम जिन तकनीकों पर भरोसा करते हैं, वे कितनी स्वदेशी हैं?
तो उत्तर हमें असहज कर देता है।
हमारे मोबाइल फोन, सर्च इंजन, ई-मेल सेवाएँ, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, क्लाउड स्टोरेज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स लगभग सब कुछ विदेशी तकनीक और विदेशी कंपनियों पर आधारित है। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का डिजिटल ढांचा बाहर की दुनिया से संचालित हो रहा है। ऐसे में “आत्मनिर्भर” होने का दावा कागज़ पर तो अच्छा लगता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहती है।
आर्थिक आंकड़े बनाम ज़मीनी सच्चाई
कहा जा रहा है कि भारत विश्व की तीसरा सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। यह सुनने में गर्व का विषय है, लेकिन सवाल यह है कि क्या आम नागरिक की ज़िंदगी में इसका असर दिख रहा है?
अगर अर्थव्यवस्था सचमुच मज़बूत होती, तो
युवाओं को रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ता
पढ़े-लिखे लोग अस्थायी, कम वेतन वाली नौकरियों में फँसे नहीं होते
छोटे व्यापारी डर और अनिश्चितता में अपना धंधा नहीं चला रहे होते
GDP का बढ़ना तब सार्थक होता है जब प्रति व्यक्ति आय, रोजगार की स्थिरता और सम्मानजनक जीवन स्तर भी साथ-साथ बढ़े।
डर का माहौल और निवेश का संकट
कल्पना कीजिए आपका कोई छोटा सा दफ़्तर, दुकान या होटल है।
अगर वहाँ रोज़ तोड़-फोड़ हो, आसपास माहौल अस्थिर हो, कभी भी हड़ताल या हिंसा का डर बना रहे तो क्या आप शांति से व्यापार कर पाएँगे?
शायद नहीं।
यही स्थिति बड़े स्तर पर विदेशी निवेशकों के साथ भी है।
जब वे देखते हैं कि...
कभी धर्म के नाम पर सड़कें जाम हैं
कभी जाति के नाम पर हिंसा और तोड़-फोड़
कानून व्यवस्था बार-बार सवालों के घेरे में
तो वे स्वाभाविक रूप से पूछते हैं:
“क्या हमारा निवेश यहाँ सुरक्षित है?”
और अगर जवाब “निश्चित नहीं” हो, तो वे निवेश किसी और देश में ले जाते हैं। यह कोई साजिश नहीं, बल्कि सीधा व्यावसायिक निर्णय होता है।
युवा देश, लेकिन बेरोजगार युवा
भारत दुनिया का सबसे युवा देश कहलाता है। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत होनी चाहिए थी।
लेकिन आज सच्चाई यह है कि...
डिग्रीधारी युवा बेरोजगार हैं
सरकारी भर्तियाँ सीमित हैं
निजी क्षेत्र सस्ते कॉन्ट्रैक्ट और अस्थायी नौकरी तक सिमट रहा है
राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति भी चिंताजनक है। कई राज्य कर्ज़ पर चल रहे हैं। जब खजाना ही खाली हो, तो स्थायी रोजगार कहाँ से आएगा?
फ्री योजनाएँ: राहत या दीर्घकालीन बोझ?
निःशुल्क योजनाएँ तत्काल राहत देती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।
लेकिन दीर्घकाल में...
ये राज्यों पर भारी आर्थिक बोझ बनती हैं
उत्पादकता नहीं बढ़ातीं
आत्मनिर्भरता की जगह निर्भरता पैदा करती हैं
अब खुद कई नेता और मंत्री भी स्वीकार करने लगे हैं कि यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।
मुद्दों का भटकाव और जनता की मानसिक थकान
जब रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग जैसे मूल सवालों का जवाब नहीं मिलता, तो अक्सर जनता का ध्यान दूसरे मुद्दों की ओर मोड़ दिया जाता है...
कभी धर्म, कभी जाति, कभी भावनात्मक राष्ट्रवाद।
यह खेल हर सरकार किसी न किसी रूप में करती आई है कोई ज़्यादा, कोई कम।
लेकिन सवाल यह है कि “भेड़िया आया” वाली कहानी कितने दिन चलेगी?
आख़िरकार जनता कों...
घर चलाना है
बच्चों को पढ़ाना है
सम्मान के साथ जीना है
और इसके लिए स्थायी रोजगार और पर्याप्त आय चाहिए, न कि केवल भावनात्मक नारों की खुराक।
समाधान की ओर: विचार, संसाधन और विज़न
देश में कमी प्रतिभा की नहीं है,
कमी है संसाधनों, नीति-समर्थन और दूरदर्शी सोच की।
आज भी ऐसे अनगिनत युवा हैं जिनके पास...
रोजगार सृजन के ठोस विचार हैं
स्थानीय स्तर पर हज़ारों नौकरियाँ पैदा करने की क्षमता है
तकनीक, कृषि, मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं में नए मॉडल हैं
लेकिन इन विचारों को ज़मीन पर उतारने के लिए चाहिए....
सरकारी सहयोग
वित्तीय संसाधन
धैर्य और समय
अगर सरकार केवल योजनाएँ बाँटने के बजाय विजन को समर्थन दे, तो परिणाम न केवल आर्थिक होंगे, बल्कि सामाजिक रूप से भी अत्यंत लाभकारी होंगे।
भारत को आज किसी नए नारे की नहीं,
बल्कि ईमानदार आत्ममंथन और ठोस कार्ययोजना की ज़रूरत है।
धर्म और जाति समाज का हिस्सा हो सकते हैं,
लेकिन रोजगार, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन किसी भी राष्ट्र की असली नींव होते हैं।
जब तक ये नींव मज़बूत नहीं होगी,
तब तक आँकड़ों की ऊँचाई आम आदमी की ज़िंदगी की गहराई नहीं भर पाएगी।
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