Thursday, February 12, 2026

सबसे जीवित अवस्था

 सबसे जीवित अवस्था


मन के अँधेरे कमरे में

सबसे पहले एक चित्र उभरता है

अधूरा, धुंधला,

पर उसमें धड़कन होती है।


वह चित्र शब्द नहीं माँगता,

न माप, न तौल,

बस एक चुप सी ज़िद

“मैं बनना चाहता हूँ।”


फिर सोच की उँगलियाँ

उस चित्र की रेखाएँ टटोलती हैं,

पुरानी यादों के टुकड़े जोड़ती हैं,

पहले से जानी हुई राहों से

नई पगडंडियाँ बनाती हैं।


कुछ भी शून्य से नहीं आता,

हर नई समझ

पुराने अनुभवों की पीठ पर खड़ी होती है,

जैसे बीज मिट्टी से लड़ता नहीं,

उसी में रास्ता खोजता है।


और डर

वह ठंडी छाया है

जो मन की खिड़कियाँ बंद कर देती है।

जहाँ डर बैठता है

वहाँ प्रश्न दम घुटने लगते हैं।


लेकिन जैसे ही

“क्यों” ने “डर” का हाथ छोड़ा,

भीतर के दरवाज़े खुलने लगे।

समझने की कोशिश ने

मन को तेज़ कर दिया,

हल्का कर दिया।


जब कल्पना उड़ती है,

सीखना साथ चलता है,

और भय रास्ते से हट जाता है

तब मन

अपने सबसे सच्चे रूप में काम करता है।


न सबसे तेज़,

न सबसे ऊँचा

बस सबसे जीवित।

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