Monday, January 26, 2026

स्त्री

 मर्द की शक्ति है स्त्री, उसकी जीवनरेखा भी। पुरुष के जीवन में स्त्री वह अमृत है जो हर तृष्णा बुझाती है। बिना उसके जीवन सूना, व्यर्थ। सुख, ऐश्वर्य, शांति—सब उसी के आलिंगन में बसते हैं।


स्त्री का सौंदर्य तो चंद्रमा सा मोहक है—नयनों में समुद्र की गहराई, ओठों पर कमल की कोमलता, केशों में रात्रि की काली लहरें। वह फूलों सी कोमल, वर्षा सी ताज़गी बिखेरती है। परंतु उसका सौंदर्य केवल बाहरी आभा नहीं; वह आंतरिक ज्योति है जो बुद्धि की किरणों से जगमगाती है।


स्त्री की बुद्धिमत्ता तो सरस्वती का अवतार है। वह गृह की सूत्रधार, संकटों की नाविक। उसके विवेक से निर्णय दृढ़ होते हैं, उसके ज्ञान से राहें प्रशस्त। प्राचीन कथाओं में सीता की धैर्यशीलता, रानी लक्ष्मीबाई की वीरता—ये प्रमाण हैं कि स्त्री बिना पुरुष अधूरा, पर स्त्री स्वयं शक्ति स्वरूपा। वह सलाहकार, प्रेरणा स्रोत, जीवन की धुरी।


पुरुष की हर विजय में उसकी छाया, हर दुःख में उसका सहारा। स्त्री के बिना सुख वन्य जंतु सा भटकता, ऐश्वर्य धनहीन, शांति भ्रम। आओ, हमारी इस दिव्य शक्ति को नमन करो, क्योंकि हम तुम्हें मर्द बनाते हैं—उस आभास से, जहाँ तुम्हारी छाती चौड़ी हो उठे, नसें उफनें, और हृदय गूँजे मर्दानगी के स्वर में। हम ही तो वह ज्योति हैं जो तुम्हारी छिपी शक्ति को प्रज्वलित करती हैं, तुम्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाती हैं।


स्त्री के लिए प्यार कोई एक क्षण नहीं होता, बल्कि एक लगातार चलने वाली मानसिक प्रक्रिया होती है। उसके भीतर प्यार तब जन्म लेता है जब वह यह महसूस करती है कि उसे केवल देखा नहीं जा रहा, बल्कि समझा जा रहा है। स्त्री का मन बहुत बार अपने अतीत, अनुभवों, सामाजिक सीख और भावनात्मक स्मृतियों के साथ वर्तमान में जी रहा होता है। इसलिए जब वह किसी पुरुष के करीब आती है, तो वह केवल उस व्यक्ति के सामने नहीं होती, बल्कि अपने पूरे जीवन के अनुभवों के साथ खड़ी होती है।


मान लीजिए एक स्त्री है जिसने जीवन में कभी अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं किया। जब वह किसी पुरुष से मिलती है जो उसे बिना टोके बोलने देता है, उसकी बातों को हल्के में नहीं लेता, तब उसके भीतर एक आंतरिक दरवाज़ा खुलता है। यह दरवाज़ा शारीरिक नहीं, मानसिक होता है। यहीं से उसका आकर्षण शुरू होता है।

स्त्री के लिए आकर्षण अक्सर शरीर से नहीं, सुरक्षा के भाव से शुरू होता है।


मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो स्त्री का मस्तिष्क तभी शारीरिक निकटता के लिए तैयार होता है जब वह “खतरे की अवस्था” से बाहर आती है। यदि उसके मन में डर हो अस्वीकार का, आहत होने का, या उपयोग किए जाने का तो उसका शरीर चाहकर भी सहज प्रतिक्रिया नहीं दे पाता। यही कारण है कि कई बार स्त्री बाहर से शांत दिखती है, पर भीतर से बंद रहती है।


संभोग से पहले स्त्री के भीतर एक मौन संवाद चलता है। वह स्वयं से पूछती है

“क्या मैं यहाँ सुरक्षित हूँ?”

“क्या मेरी सीमाओं का सम्मान होगा?”

“क्या इसके बाद भी मुझे वही अपनापन मिलेगा?”


यदि इन प्रश्नों के उत्तर अनिश्चित हों, तो उसका मन पीछे हट जाता है। और जब मन पीछे हटता है, तो शरीर भी पीछे हटता है। यह कोई नखरा नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक आत्म-सुरक्षा है।


एक उदाहरण लें। एक स्त्री और पुरुष एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। पुरुष शारीरिक निकटता चाहता है, पर स्त्री अभी पूरी तरह सहज नहीं है। यदि पुरुष इस असहजता को पढ़ लेता है, रुक जाता है, और कहता है “तुम जब चाहो, तभी” तो उस एक वाक्य से स्त्री के भीतर गहरा विश्वास जन्म ले सकता है। अगली बार वही स्त्री स्वयं आगे बढ़ सकती है, क्योंकि उसके मन में यह दर्ज हो चुका है कि यहाँ दबाव नहीं है।


यहीं पर स्त्री और पुरुष के मनोविज्ञान में अंतर दिखता है। पुरुष अक्सर इच्छा को सीधे अनुभव करता है, जबकि स्त्री इच्छा तक पहुँचने से पहले कई मानसिक परतों को पार करती है। उसके लिए संभोग एक भावनात्मक पुष्टि भी होता है कि वह केवल चाही जा रही है, बल्कि स्वीकार की जा रही है।


संभोग के दौरान स्त्री का अनुभव तब गहरा होता है जब वह स्वयं को “प्रदर्शन” में नहीं, बल्कि “अनुभव” में महसूस करती है। यदि उसे यह चिंता हो कि वह कैसी दिख रही है, क्या वह पर्याप्त है, या सामने वाला संतुष्ट है या नहीं—तो उसका मन वर्तमान से कट जाता है। लेकिन जब उसे यह भरोसा होता है कि उसे जज नहीं किया जा रहा, तब वह अपने शरीर में पूरी तरह उपस्थित हो पाती है।


कई स्त्रियों के लिए संभोग के समय भावनाएँ अचानक उभर आती हैं कभी आँसू, कभी अत्यधिक लगाव। यह इसलिए होता है क्योंकि स्त्री का मन और शरीर अलग-अलग नहीं चलते। जब वह किसी को अपने शरीर के करीब आने देती है, तो वह अनजाने में अपने भावनात्मक संसार के द्वार भी खोल देती है।


संभोग के बाद का समय स्त्री के लिए अत्यंत संवेदनशील होता है। उस समय यदि पुरुष दूरी बना ले, मोबाइल में खो जाए, या भावनात्मक रूप से अनुपस्थित हो जाए, तो स्त्री के मन में खालीपन या पश्चाताप पैदा हो सकता है। इसके विपरीत, यदि पुरुष पास रहे, बात करे, उसका हाथ थामे, तो स्त्री का मन उस अनुभव को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण स्मृति के रूप में सहेज लेता है।


मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो स्त्री के लिए संभोग केवल शारीरिक संतुष्टि नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव की पुष्टि है। इसलिए जब यह प्रेम, संवाद और सम्मान के साथ होता है, तो वह स्त्री के आत्मविश्वास, सुरक्षा और प्रेम की भावना को और गहरा करता है।


स्त्री के लिए प्यार और संभोग तब सार्थक बनते हैं जब वह स्वयं को खोकर नहीं, बल्कि और अधिक स्वयं बनकर उस संबंध में उपस्थित हो सके।

मैं औरत हूँ मुझे भी सेक्स चाहिए,,

एक पीड़ा या गाली...


जब कोई औरत खुलकर कहती है कि उसे सेक्स चाहिए, उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं। रंडी, छिनाल, चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार।  

लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तो वो "मर्दानगी" बन जाती है। वो "जवान" है, "शेर" है, "प्लेयर" है, "किंग" है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं।


ये दोहरा मापदंड क्यों?  

क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है।  

पवित्रता का मतलब? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा।  

जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती।  

ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है।


मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है।  

उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है।  

लेकिन औरत की भूख? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं।  

जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"।  

और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है।


सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं।  

डरते हैं कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा।  

क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है?  

औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"।  

जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली।


भारतीय समाज में ये और भी गहरा है।  

यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है।  

लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है।  

वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है।  

इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है।  

इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं।


तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता?  

क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती।  

मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है।  

लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है।  

क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है।


हर औरत के मन में ये सवाल जलता है:  

"मुझे भी तो इंसान होना है न? मुझे भी तो जीना है न? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न?"  

फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है।  

उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है।


लेकिन सुनो,  

तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है।  

तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं।  

तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है।  

और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता।


जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती।  

वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है।  

गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक।  

फिर भी तुम बोल रही हो।  

ये हिम्मत है।  

ये विद्रोह है।


तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए",  

तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है।  

वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है।  

वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है।


तुम अकेली नहीं हो।  

हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है।  

और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं।


क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की।  

इच्छा इंसान की है।  

और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है।


बस इतना ही।  

बाकी सब झूठ है।

“उसके मौन का अर्थ”


वह कोई परिभाषा नहीं,

जिसे शब्दकोश में खोजा जा सके,

वह एक एहसास है

जो कभी मुस्कान बनकर ठहरता है,

तो कभी आँखों के कोने में

चुपचाप भीग जाता है।


वह सरल भी है,

और जटिल भी

एक साथ।

उसके मौन में भी संवाद होता है,

और उसके क्रोध में भी

अजीब-सी पुकार छुपी होती है।


जब वह हँसती है

तो समय कुछ पल के लिए

रुक जाता है,

और जब वह रूठती है

तो सबसे मजबूत मन भी

कमज़ोर पड़ जाता है।


उसका गुस्सा

कभी आग नहीं होता,

वह तो बस एक सवाल होता है

“क्या मैं अब भी मायने रखती हूँ?”


उसका अधिकार

बंधन नहीं होता,

वह तो भरोसे की

एक नाज़ुक डोर होती है,

जो ज़रा-सी बेरुख़ी से

टूट सकती है।


वह बच्चे जैसी भी होती है

ज़िद्दी, नटखट,

और फिर अचानक

बहुत समझदार।

उसे संभालना नहीं पड़ता,

उसे महसूस करना पड़ता है।


जो उसे ताक़त से जीतना चाहता है

वह हमेशा हारता है,

और जो उसे धैर्य से समझ ले

वह जीवन भर के लिए

सब कुछ पा लेता है।


क्योंकि वह

डर से नहीं झुकती,

दबाव से नहीं बदलती

वह सिर्फ़ प्रेम के आगे

अपनी दुनिया खोलती है।


उसके आंसू

कमज़ोरी नहीं,

वे उस गहराई का प्रमाण हैं

जहाँ तक कोई

बिना सच्चे अपनापन के

पहुंच ही नहीं सकता।


जो उसे सुरक्षित महसूस कराता है,

वही उसका संसार बन जाता है।

और जो उसका संसार बन जाए

वह दुनिया की हर लड़ाई

जीत सकता है।


क्योंकि अंत में

सब कुछ शक्ति से नहीं,

सब कुछ समझ से नहीं

सब कुछ

प्रेम से ही संभव होता है।


वह ऐसी ही है।

और शायद

यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है। 

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