महिला–पुरुष रिश्तों की सबसे बड़ी समस्या: संवाद की कमी या गलत अपेक्षाएँ?
महिला और पुरुष के रिश्तों को अक्सर जटिल कहा जाता है, पर सच यह है कि ये रिश्ते जटिल नहीं, बल्कि अनकहे संवाद और अधूरी समझ के बोझ तले दब जाते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि समस्या संवाद की कमी है या गलत अपेक्षाएँ, बल्कि सच्चाई यह है कि गलत अपेक्षाएँ संवाद की कमी से ही जन्म लेती हैं।
"संवाद: रिश्तों की आत्मा"
जीवन को संवाद के बिना समझा ही नहीं जा सकता। संवाद वह सेतु है जो दो व्यक्तियों के मन, भावनाओं और अनुभवों को जोड़ता है। यह संवाद केवल शब्दों तक सीमित नहीं होता
कभी यह मौन में होता है,
कभी व्यवहार में,
कभी साथ बैठकर,
और कभी बिना कुछ कहे समझ लेने में।
पर आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में संवाद सबसे पहले पीछे छूट जाता है। हम साथ रहते हैं, पर जुड़े नहीं रहते। एक ही घर में होकर भी एक-दूसरे के मन से अनजान होते चले जाते हैं।
"रोज़मर्रा की दौड़ और टूटता संवाद"
आज का इंसान “व्यस्त” नहीं, बल्कि “उलझा” हुआ है। काम, ज़िम्मेदारियाँ, सामाजिक अपेक्षाएँ सब कुछ इतना हावी हो गया है कि रिश्तों के लिए समय नहीं बचता।
हम पूछना भूल जाते हैं:
तुम कैसी हो?
आज तुम्हारा दिन कैसा था?
तुम थके हुए लग रहे हो, कुछ कहना चाहते हो?
जब ये प्रश्न पूछे नहीं जाते, तब रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक हो जाते हैं। और इसी खाली जगह को गलत अपेक्षाएँ भर देती हैं।
"गलत अपेक्षाएँ कैसे जन्म लेती हैं"
जब संवाद नहीं होता, तो हम मान लेते हैं:
“उसे तो समझना ही चाहिए”
“उसे पता होना चाहिए कि मुझे कैसा लग रहा है”
“अगर वह परवाह करता/करती, तो खुद पूछता/पूछती”
यहीं से रिश्तों में दरार शुरू होती है।
एक व्यक्ति अपेक्षा करता है, दूसरा अनजान रहता है।
एक दुखी होता है, दूसरा कारण तक नहीं समझ पाता।
"समाज द्वारा थोपी गई भूमिकाएँ"
हमारे समाज ने महिला और पुरुष के लिए पहले से ही कुछ भूमिकाएँ तय कर दी हैं:
महिला = रसोई, घर, त्याग
पुरुष = बाहर का काम, कमाई, ज़िम्मेदारी
पर सवाल यह है....
क्या पुरुष ने कभी रसोई में जाकर यह समझने की कोशिश की कि महिला का दिन कैसा बीतता है?
क्या उसने उसके कर्म में शामिल होकर संवाद किया?
और क्या महिला ने कभी यह समझने का प्रयास किया कि बाहर की दुनिया में पुरुष किस मानसिक दबाव से गुजरता है?
कर्म के माध्यम से संवाद—यानी साथ काम करना, साथ जिम्मेदारी उठाना सबसे सशक्त संवाद होता है। पर यही संवाद सबसे दुर्लभ है।
संवाद के विभिन्न रूप
रिश्तों में केवल प्रेम का संवाद नहीं, बल्कि हर परिस्थिति के लिए अलग संवाद ज़रूरी है:
बीमारी में संवेदना का संवाद
कष्ट में मौन सहारा
असफलता में साहस देने वाला संवाद
थकान में समझ का संवाद
और रोज़मर्रा में सामान्य, मानवीय संवाद
जब ये संवाद नहीं होते, तो रिश्ता केवल निभाया जाता है, जिया नहीं जाता।
रिश्ते क्यों टूटते हैं?
रिश्ते एक दिन में नहीं टूटते।
वे धीरे-धीरे अनसुने शब्दों, अनकहे दर्द और अधूरी अपेक्षाओं से कमजोर होते जाते हैं।
जब समझना नामुमकिन हो जाता है, तब दूरी बढ़ती है, और वही दूरी अंततः टूटन में बदल जाती है।
समाधान क्या है?
समाधान बहुत जटिल नहीं है, पर साहस मांगता है:
बोलना सीखिए
सुनना सीखिए
बिना जज किए समझना सीखिए
और सबसे ज़रूरी पूछना सीखिए
क्योंकि रिश्ते अधिकार से नहीं, संवाद से चलते हैं।
महिला–पुरुष रिश्तों की सबसे बड़ी समस्या न तो केवल संवाद की कमी है, न ही केवल गलत अपेक्षाएँ
समस्या है संवाद की कमी से जन्मी गलत अपेक्षाएँ।
यदि हम संवाद को प्राथमिकता दें, तो अपेक्षाएँ स्वतः संतुलित हो जाएँगी।
और तब रिश्ते बोझ नहीं, सहारा बनेंगे।
क्योंकि अंत में,
रिश्ते निभाने के लिए नहीं, समझने के लिए होते हैं।
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