रिश्ते में एक-दूसरे की गोपनीयता एक-दूसरे के पास अमानत की तरह होती है। रिश्ते में जितना अधिक
विश्वास और सम्मान होता है, उतनी ही गहराई से
एक-दूसरे की गोपनीयता सुरक्षित रहती है।जब आपसी बातें आपस में ही सीमित रहती हैं,तो किसी तीसरे व्यक्ति को दख़ल देने का साहस नहीं होता। लेकिन जैसे ही एक पक्ष दूसरे की गोपनीय बातों को उजागर करता है,उसी क्षण तीसरे व्यक्ति की एंट्री हो जाती है।
रिश्ते में एक इंसान दूसरे पर भरोसा करके अपनी कमज़ोरियाँ साझा करता है और यह बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन उन कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाने के बजाय उनकी गोपनीयता बनाए रखना ही
एक अच्छे इंसान की पहचान है। आप किसी से मुँह से चाहे जितना भी “मैं तुमसे प्यार करता/करती हूँ” कह लें, अगर आप उसकी गोपनीयता सुरक्षित नहीं रख सकते,तो उस प्रेम की कोई कीमत नहीं होती।
आज के इस बिछड़ने वाले दौर में,रिश्ता टूटने के बाद भी एक-दूसरे की गोपनीय बातें अमानत बनी रहती हैं या नहीं यही सबसे अहम बात है।आप जितनी ज़्यादा
रिश्ते के दूसरे इंसान की गोपनीयता का सम्मान करेंगे,
उतना ही ज़्यादा उसके दिल में आपके लिए सम्मान
बढ़ता चला जाएगा।
"मुझमें- तुझमें"
मुझमें तुझमें
कोई सीमा नहीं खिंची,
बस दो साँसें हैं
जो एक ही लय में चलना सीख रही हैं।
तू मेरे लिए त्याग नहीं है,
मैं तेरे लिए सुरक्षा का नाम नहीं
हम एक-दूसरे को
पूरा करने नहीं,
समझने आए हैं।
तेरे मौन में
मैंने शब्द ढूँढे,
मेरी उलझनों में
तूने धैर्य रखा,
यही तो साझेदारी है
जहाँ हार भी साझा होती है।
मुझमें तुझमें
न कोई ऊँचा, न कोई नीचे,
तेरे सपने
मेरी आँखों में जगह पाते हैं,
मेरी थकान
तेरे कंधे पर हल्की हो जाती है।
तू जब आगे बढ़ती है
तो मैं पीछे नहीं छूटता,
मैं जब बदलता हूँ
तो तू असहज नहीं होती
प्रेम डर नहीं,
विश्वास पैदा करता है।
मुझमें तुझमें
देह से आगे की निकटता है,
जहाँ सहमति स्पर्श से पहले आती है,
और सम्मान
हर इच्छा से पहले।
हम साथ खड़े नहीं,
साथ चलते हैं
कभी तेरी गति से,
कभी मेरी,
और कभी रुककर
एक-दूसरे को सुनते हुए।
मुझमें तुझमें
प्रेम कोई घोषणा नहीं,
यह रोज़ निभाया जाने वाला
एक शांत वादा है
कि मैं तुम्हें बदलूँगा नहीं,
और तुम मुझे छोड़ोगी नहीं।
"वह क्षण"
जब दो लोग पास आते हैं, तो सबसे पहले शरीर नहीं मिलता साँस मिलती है। साँस की लय बदलते ही समय का काँटा धीमा पड़ने लगता है। आँखें बंद हों या खुली, भीतर एक रोशनी-सी फैलती है। हाथ का स्पर्श सिर्फ त्वचा तक नहीं रुकता; वह नसों से होता हुआ स्मृतियों तक पहुँचता है, वहाँ जहाँ शब्द नहीं होते।
स्त्री और पुरुष दो अलग धाराएँ उस पल में अपनी-अपनी दिशा छोड़ देती हैं। स्त्री का मन लहरों जैसा है; वह हर सूक्ष्म संकेत पकड़ लेता है आवाज़ की थरथराहट, ठहराव की नर्मी, भरोसे की गर्मी। पुरुष का मन धरातल जैसा है; स्थिरता देता है, थामे रखता है, ताकि बहाव बिखरे नहीं। जब ये दोनों मिलते हैं, तो भीतर एक पुल बनता है जहाँ न कोई आगे, न कोई पीछे।
स्पर्श आगे बढ़ता है तो हर अंग जागता है, मानो किसी ने भीतर के दीपक जला दिए हों। पैर ज़मीन को महसूस करते हैं, रीढ़ हल्की हो जाती है, कंधों का बोझ पिघलता है। दिल की धड़कन भाषा बन जाती है तेज़ नहीं, सटीक। उस सटीकता में अहंकार चुप हो जाता है। “मैं” और “तुम” के बीच की रेखा धुँधली पड़ती है।
यहाँ चेतन और अवचेतन हाथ मिलाते हैं। पुरानी झिझकें, डर, अधूरे वाक्य सब पिघलते हैं। भरोसा किसी वचन से नहीं, उपस्थिति से पैदा होता है। एक पल ऐसा आता है जब चाहना भी ठहर जाती है; बस होना रह जाता है। उस होने में शरीर ध्यान बन जाता है हर कोशिका सुन रही है, हर नस उत्तर दे रही है।
एक उदाहरण सोचिए: दो लोग बारिश में खड़े हैं। वे दौड़ नहीं रहे, छाते नहीं खोल रहे। बस खड़े हैं भीगते हुए। पानी उन्हें अलग-अलग नहीं करता, एक ही अनुभव में भिगो देता है। वैसे ही, उस क्षण में सुख कोई लक्ष्य नहीं रहता; वह सह-यात्री बन जाता है। जब लक्ष्य हटता है, तो विस्तार अपने आप होता है।
समापन किसी विस्फोट जैसा नहीं, बल्कि गहरी शांति जैसा होता है। साँस फिर सामान्य होती है, पर भीतर कुछ स्थायी बदल चुका होता है। एक को दूसरे में जीत नहीं मिलती; दोनों को अपने-अपने भीतर एक नई जगह मिलती है। वहाँ से लौटकर दुनिया वही रहती है, पर देखने वाला बदल चुका होता है।
"यही वह मिलन है जहाँ शरीर मार्ग है, मन साथी है, और चेतना घर लौट आती है।"
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