🎋शहर और शून्य के बीच
वह रोज़ मेट्रो में बैठती है,
सैकड़ों चेहरों के बीच एक चेहरा बनकर।
कानों में हेडफ़ोन,
दिल में हल्का शोर
जो किसी गाने से ज़्यादा सच्चा है।
ऑफिस में मुस्कान लगाना अब उसका रोज़ का मेकअप है,
और “मैं ठीक हूँ” उसका सबसे ज़्यादा बोला गया झूठ।
कभी वह सोचना चाहती है
कि इस तेज़ शहर में
किसी को सोचने की भी जगह बची है या नहीं।
उसके अंदर कहीं एक बच्ची अब भी है,
जो बारिश में भीगना चाहती है
पर अब उसे सिर्फ़ ईमेल की बारिश मिलती है।
🎋रिश्तों की रिक्तता
उसने प्रेम किया
उनसे जो उसे “independent” कहते थे,
पर जब वह अपनी बात रखती,
तो वही लोग उसे “complex” कहने लगे।
वह समझ नहीं पाई
कि समानता का अर्थ केवल बिल बाँटना नहीं होता,
कभी भावना बाँटना भी होता है।
रात को जब वह फोन बंद करती है,
तो भीतर से एक आवाज़ उठती है
“क्या मैं किसी को प्यार करती हूँ,
या सिर्फ़ किसी की उपस्थिति चाहती हूँ?”
कभी-कभी वह खुद से ही प्रेम करने की कोशिश करती है,
पर हर बार भीतर की आलोचना
उसके कान में फुसफुसाती है
“तू अभी भी पर्याप्त नहीं है।”
🎋दफ़्तर, सपने और थकान
वह काम करती है
कड़ी, ईमानदारी से,
पर हर सफलता के बाद
कोई न कोई सवाल उठता है
“किसकी मदद से पहुँची होगी?”
उसे यह भी पता है कि
अगर वह रो दे, तो “भावुक” कहलाएगी,
और अगर सख़्त बोले, तो “घमंडी।”
वह संतुलन की कलाकार है
मुस्कान और सख़्ती के बीच झूलती रस्सी पर चलती।
कभी-कभी उसे लगता है
उसका करियर एक काँच की दीवार है
जो पारदर्शी है, पर पार नहीं होती।
🎋आत्म-संवाद
रात के दो बजे,
वह अपनी लैपटॉप स्क्रीन बंद करती है,
और खुद को देखती है
बिना फ़िल्टर, बिना सजावट।
वह सोचती है
“कब आख़िरी बार मैंने रोने दिया खुद को?
कब आख़िरी बार मैंने सिर्फ़ चुप रहकर कुछ महसूस किया?”
वह अब जानती है कि
“self-love” कोई इंस्टाग्राम का शब्द नहीं,
बल्कि एक कठोर साधना है
जहाँ अपने डर को भी गले लगाना पड़ता है।
धीरे-धीरे,
वह अपने भीतर के खाली कमरों में
रोशनी रखने लगी है।
🎋पुनर्जन् डिजिटल युग की आत्मा
अब वह वही नहीं रही
वह “perfect” बनने की कोशिश छोड़ चुकी है।
अब उसे समझ आ गया है
कि हर औरत को देवी नहीं,
बस ईमानदार मनुष्य बनने का अधिकार चाहिए।
वह अब लाइक्स नहीं गिनती,
वह उन रातों को गिनती है
जहाँ उसने खुद को माफ़ किया।
अब वह रिश्तों से नहीं,
अपनी सच्चाई से परिभाषित होती है।
उसका प्रेम अब किसी व्यक्ति नहीं,
एक विचार है
कि मैं खुद अपनी शुरुआत हूँ,
और अपनी मंज़िल भी।
वह चलती है
न अकेली, न भीड़ में
बस अपने भीतर के शहर में,
जहाँ अब शोर नहीं,
सिर्फ़ उसकी साँसों की सच्चाई है।
🎋अब वह हर सुबह खुद से कहती है
“आज मुझे किसी को साबित नहीं करना,
सिर्फ़ खुद को महसूस करना है।”
क्योंकि उसने समझ लिया है
कि आधुनिकता का अर्थ कपड़ों या करियर में नहीं,
भावनाओं को स्वीकारने की हिम्मत में है।
और यह हिम्मत,
अब उसके भीतर स्थायी हो चुकी है।
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